हनुमान अंश : रील के नायक नहीं, रियल महानायक की कथा
भारतीय संस्कृति और Gen Z के बीच नए सांस्कृतिक संवाद का संकेत

डॉ. मुन्नालाल देवदास
भारतीय सिनेमा का इतिहास केवल मनोरंजन का इतिहास नहीं है, बल्कि यह भारतीय समाज की चेतना, संवेदना और सांस्कृतिक यात्रा का भी दर्पण रहा है। वर्ष 1913 में दादा साहब फाल्के ने भारतीय सिनेमा की शुरुआत की। उनकी पहली मूक फिल्म ‘राजा हरिश्चंद्र’ पौराणिक कथा पर आधारित थी। इस दृष्टि से देखें तो भारतीय सिनेमा के आरंभ से ही उसका संबंध भारतीय संस्कृति, आध्यात्मिक चेतना और जीवन-मूल्यों से जुड़ा रहा है।
आज वर्ष 2026 में ‘हनुमान अंश’ जैसी फिल्म एक अलग कारण से चर्चा में है। यह चकाचौंध, महंगे सितारों, अश्लीलता अथवा फूहड़ मनोरंजन पर आधारित होने के बजाय बाबा नीम करौली के जीवन-दर्शन, सेवा, करुणा और मानव कल्याण के संदेश को केंद्र में रखती है। यही इसकी सबसे महत्वपूर्ण विशेषता है।
बाबा नीम करौली ने अपना जीवन व्यक्तिगत यश और प्रसिद्धि के लिए नहीं, बल्कि सेवा, करुणा और मानव कल्याण के लिए समर्पित किया। इसलिए उनके जीवन-दर्शन पर आधारित फिल्म ऐसे समय में विशेष अर्थ रखती है, जब पर्दे के नायक और वास्तविक जीवन के नायक के बीच का अंतर समझना पहले से अधिक जरूरी हो गया है।
आज की Gen Z सोशल मीडिया, रील्स और डिजिटल लोकप्रियता के दौर की पीढ़ी है। कुछ सेकंड की एक रील किसी व्यक्ति को रातोंरात लोकप्रिय बना सकती है। लाइक, शेयर, फॉलोअर और वायरलिटी सफलता के नए पैमाने बन गए हैं। लेकिन इसी डिजिटल युग में एक महत्वपूर्ण प्रश्न भी सामने आता है—क्या लोकप्रिय होना ही महान होना है?
‘हनुमान अंश’ इस प्रश्न का उत्तर बाबा नीम करौली के जीवन के माध्यम से देती दिखाई देती है। जिस व्यक्ति ने अपना जीवन निःस्वार्थ सेवा और मानव कल्याण के लिए समर्पित कर दिया, उसके सामने फिल्मी चरित्रों की काल्पनिक वीरता को देखने की दृष्टि स्वाभाविक रूप से बदल जाती है। यहीं से बाबा नीम करौली का जीवन आज की पीढ़ी के लिए महत्वपूर्ण बनता है। वे केवल किसी कथा के पात्र नहीं, बल्कि सेवा और मानवता को जीवन का आधार बनाने वाले ऐसे व्यक्तित्व के रूप में सामने आते हैं, जिनसे युवा प्रेरणा ले सकते हैं।
यह बदलाव केवल किसी एक फिल्म की चर्चा नहीं है, बल्कि समाज की बदलती प्राथमिकताओं का संकेत भी माना जा सकता है। ‘हनुमान अंश’ की एक उल्लेखनीय विशेषता यह है कि यह सीमित बजट और अपेक्षाकृत कम संसाधनों में बनी फिल्म के रूप में सामने आती है। इसमें बड़े और महंगे सितारों की चमक-दमक पर निर्भरता नहीं दिखाई देती। इसके बावजूद यदि दर्शकों की रुचि इसकी ओर बढ़ती है, तो यह सिनेमा की सफलता के स्थापित मानकों पर विचार करने का अवसर देता है।
क्या किसी फिल्म की सफलता के लिए करोड़ों रुपये का बजट, बड़े सितारे और भव्य प्रचार अनिवार्य हैं? शायद दर्शक अब यह भी देखना चाहता है कि कहानी क्या कह रही है और वह उसके जीवन को कितना छूती है। यदि किसी फिल्म का विषय जीवन को स्पर्श करता है, पात्र प्रेरणा देते हैं और कथा मन में सकारात्मक भाव उत्पन्न करती है, तो सीमित साधनों में बनी प्रस्तुति भी दर्शकों के दिल तक पहुंच सकती है।
आज सिनेमा और डिजिटल मनोरंजन के अनेक माध्यमों में अश्लीलता, द्विअर्थी संवाद, अनावश्यक हिंसा और फूहड़ता को लेकर बहस होती रही है। ऐसे वातावरण में ‘हनुमान अंश’ का साफ-सुथरा और पारिवारिक स्वरूप अपने आप में महत्वपूर्ण है। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि ऐसी फिल्म परिवार के विभिन्न आयु वर्गों को एक साथ बैठकर देखने और उसके विषय पर बातचीत करने का अवसर देती है। जब बच्चे, युवा, माता-पिता और बुजुर्ग किसी फिल्म को एक साथ देखें और उसके संदेश पर विचार करें, तो सिनेमा केवल मनोरंजन नहीं रहता, बल्कि सामाजिक और सांस्कृतिक संवाद का माध्यम बन जाता है।
Gen Z को संस्कृति के नाम पर केवल उपदेश देने से वह संस्कृति के करीब नहीं आएगी। उसे ऐसे जीवंत उदाहरण चाहिए, जिनसे वह अपने समय के प्रश्नों का उत्तर खोज सके। बाबा नीम करौली का जीवन इसी दृष्टि से महत्वपूर्ण है। उनका जीवन-दर्शन यह संदेश देता है कि जीवन की सार्थकता केवल व्यक्तिगत सफलता, धन, प्रसिद्धि या लोकप्रियता में नहीं, बल्कि दूसरों के जीवन में उपयोगी बनने में भी है।
आज जब युवा अपने भविष्य, करियर और पहचान को लेकर अनेक प्रश्नों से जूझ रहे हैं, तब निःस्वार्थ सेवा और मानव कल्याण का यह दर्शन उन्हें जीवन की एक अलग दिशा दिखा सकता है। हनुमान भारतीय जीवन-दर्शन में शक्ति के साथ सेवा, सामर्थ्य के साथ विनम्रता और भक्ति के साथ लोकमंगल के प्रतीक माने जाते हैं। बाबा नीम करौली के जीवन-दर्शन में भी सेवा और मानवता का यही केंद्रीय भाव दिखाई देता है। इसीलिए ‘हनुमान अंश’ का विषय नई पीढ़ी के लिए केवल धार्मिक या आध्यात्मिक संदर्भ नहीं, बल्कि जीवन-मूल्यों से जुड़ा संदेश भी बन सकता है।
‘हनुमान अंश’ का महत्व केवल इसलिए नहीं है कि यह आध्यात्मिक विषय पर बनी फिल्म है। इसका महत्व इस बात में भी है कि यह उस स्थापित धारणा पर प्रश्न खड़ा करती है कि दर्शकों को आकर्षित करने के लिए केवल बड़े सितारे, विशाल बजट, हिंसक एक्शन और ग्लैमर आवश्यक हैं। एक ओर करोड़ों रुपये के बजट और बड़े सितारों वाली फिल्में हैं, तो दूसरी ओर सीमित संसाधनों में बनी ऐसी फिल्म भी है, जो कहानी, आस्था और जीवन-दर्शन के बल पर दर्शकों तक पहुंचने का प्रयास करती है।
इसी अर्थ में ‘हनुमान अंश’ को मुख्यधारा के मुंबईया फिल्मी फार्मूले के सामने एक सांस्कृतिक सवाल के रूप में देखा जा सकता है। यह किसी भाषा, फिल्म उद्योग या फिल्मकार के विरोध का प्रश्न नहीं है। मूल प्रश्न उस सोच का है, जिसमें मनोरंजन को मूल्य, संस्कृति और सामाजिक सरोकारों से अलग कर दिया जाता है। ‘हनुमान अंश’ यह संभावना सामने रखती है कि सार्थक भारतीय विषय भी लोकप्रिय सिनेमा का आधार बन सकते हैं और दर्शकों को मनोरंजन के साथ सकारात्मक जीवन-दृष्टि भी दे सकते हैं।
भारतीय संस्कृति कभी केवल अतीत की स्मृति नहीं रही। उसने समय के साथ स्वयं को नए रूपों और नए माध्यमों में प्रस्तुत किया है। आज डिजिटल युग में यदि भारतीय आध्यात्मिक परंपरा, संत-जीवन, सेवा और मानवता के संदेश को आधुनिक सिनेमा के माध्यम से नई पीढ़ी तक पहुंचाया जाता है, तो यह सांस्कृतिक पुनर्जागरण की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम हो सकता है।
‘राजा हरिश्चंद्र’ से शुरू हुई भारतीय सिनेमा की यात्रा में यदि आज ‘हनुमान अंश’ जैसी फिल्म फिर से भारतीय आध्यात्मिक चेतना, सेवा और मानव कल्याण को केंद्र में लाती है, तो यह एक दिलचस्प सांस्कृतिक वृत्त जैसा दिखाई देता है। लेकिन यह अतीत में लौटना नहीं है। यह अतीत के श्रेष्ठ मूल्यों को आधुनिक पीढ़ी के सामने आधुनिक माध्यम और नई भाषा में प्रस्तुत करना है। यही भारतीय संस्कृति की जीवंतता है—वह समय के साथ बदलती है, लेकिन अपने मूल जीवन-मूल्यों को पूरी तरह नहीं छोड़ती।
‘हनुमान अंश’ की सबसे बड़ी उपलब्धि उसके बजट या सितारों की संख्या में नहीं, बल्कि उसके विषय और संदेश में खोजी जानी चाहिए। ऐसे समय में जब रील की लोकप्रियता को वास्तविक उपलब्धि समझने का खतरा बढ़ रहा है, बाबा नीम करौली का जीवन Gen Z के सामने एक अलग कसौटी रखता है—लोकप्रियता से बड़ा लोकमंगल है और प्रसिद्धि से बड़ा निःस्वार्थ सेवा का भाव।
इस दृष्टि से बाबा नीम करौली केवल पर्दे के पात्र नहीं, बल्कि जीवन के वास्तविक महानायक के रूप में सामने आते हैं। कम बजट, महंगे सितारों की चमक-दमक से दूरी, अश्लीलता और फूहड़ता से परहेज तथा परिवार के साथ देखने योग्य कथानक—इन विशेषताओं के कारण ‘हनुमान अंश’ आज के सिनेमा के सामने एक महत्वपूर्ण प्रश्न रखती है—क्या दर्शक अब केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि अर्थपूर्ण अनुभव भी चाहता है?
यदि इस प्रश्न का उत्तर ‘हाँ’ है, तो ‘हनुमान अंश’ केवल एक फिल्म नहीं है। यह रील के दौर में रियल महानायक की वापसी का प्रयास है। यह भारतीय संस्कृति और Gen Z के बीच नए संवाद की संभावना है। और संभवतः यह उस सांस्कृतिक पुनर्जागरण का संकेत भी है, जिसमें भारत की नई पीढ़ी आधुनिक रहते हुए अपनी जड़ों से जुड़ना चाहती है।
डॉ. मुन्नालाल देवदास
राष्ट्रपति एवं राज्यपाल पुरस्कृत
सेवानिवृत्त प्रधान पाठक एवं नवाचार शिक्षाविद
नगर पंचायत कोपरा, जिला गरियाबंद, छत्तीसगढ़
