दिल्ली में प्रदर्शन पर यूएन के दोहरेपन पर भारत भड़का, संप्रभुता और मानवाधिकारों पर छिड़ी बहस
प्रदर्शन का तात्कालिक कारण मतदाता सूचियों का विशेष गहन पुनरीक्षण था।

राजीव त्रिपाठी
दिल्ली में मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) और मुख्य निर्वाचन आयुक्त ज्ञानेश कुमार के खिलाफ हुए प्रदर्शन के दौरान बड़ी संख्या में लोगों को हिरासत में लिए जाने पर संयुक्त राष्ट्र के मानवाधिकार कार्यालय की टिप्पणी ने भारत और अंतरराष्ट्रीय संस्था के बीच नया विवाद खड़ा कर दिया है। भारत सरकार ने संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार उच्चायुक्त कार्यालय (ओएचसीएचआर) की चिंता को अनुचित बताते हुए इसे देश के आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप करार दिया है। विदेश मंत्रालय ने संयुक्त राष्ट्र पर चुनिंदा घटनाओं पर प्रतिक्रिया देने और अलग-अलग देशों में विरोध प्रदर्शनों के प्रति अलग-अलग मानदंड अपनाने का आरोप लगाया है। इस घटनाक्रम ने शांतिपूर्ण प्रदर्शन के अधिकार, सार्वजनिक व्यवस्था, राष्ट्रीय संप्रभुता और अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं की निष्पक्षता को लेकर बहस तेज कर दी है।
भारत की आपत्ति केवल दिल्ली में पुलिस कार्रवाई पर संयुक्त राष्ट्र की टिप्पणी तक सीमित नहीं है। इसके केंद्र में यह सवाल है कि क्या अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार संस्थाएं दुनिया के सभी देशों में विरोध प्रदर्शनों और पुलिस की कार्रवाई का समान कसौटियों पर आकलन करती हैं? भारत का कहना है कि यदि किसी देश में प्रदर्शनकारियों के खिलाफ हिंसक कार्रवाई होती है, तो उस पर भी वैसी ही स्पष्टता और तत्परता दिखाई जानी चाहिए जैसी भारत के मामलों में दिखाई जाती है। दूसरी ओर, संयुक्त राष्ट्र का तर्क है कि शांतिपूर्ण सभा का अधिकार लोकतांत्रिक व्यवस्था का महत्वपूर्ण हिस्सा है और किसी भी प्रतिबंध की आवश्यकता तथा आनुपातिकता का परीक्षण होना चाहिए।
10 अक्टूबर 2026 को दिल्ली में प्रस्तावित प्रदर्शन के दौरान पुलिस ने दो हजार से अधिक लोगों को हिरासत में लिया। समाचार एजेंसी रॉयटर्स के अनुसार, प्रदर्शनकारी मुख्य निर्वाचन आयुक्त के इस्तीफे की मांग को लेकर जंतर-मंतर की ओर पहुंचना चाहते थे। पुलिस और अर्धसैनिक बलों की बड़ी तैनाती की गई, मध्य दिल्ली में मोबाइल इंटरनेट सेवाएं निलंबित की गईं तथा कई मेट्रो स्टेशन और बाजार बंद रहे। अगले दिन दिल्ली पुलिस ने बताया कि शनिवार को 2,400 लोगों को हिरासत में लिया गया था और उनमें से अधिकांश को उसी रात छोड़ दिया गया। ये आंकड़े बताते हैं कि घटनाक्रम केवल राजनीतिक बयानबाजी तक सीमित नहीं रहा, बल्कि राजधानी में सार्वजनिक व्यवस्था और नागरिक स्वतंत्रता के बीच संतुलन का गंभीर प्रश्न बन गया।
प्रदर्शन का तात्कालिक कारण मतदाता सूचियों का विशेष गहन पुनरीक्षण था। विपक्षी दलों और प्रदर्शनकारियों ने आरोप लगाया कि इस प्रक्रिया में मतदाताओं के नाम हटाने से चुनावी निष्पक्षता प्रभावित हो सकती है। उन्होंने मुख्य निर्वाचन आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग की। हालांकि, निर्वाचन आयोग और भारतीय जनता पार्टी ने मतदाता सूची में हेरफेर के आरोपों को खारिज किया है। इसलिए इस विवाद को समझते समय आरोपों और प्रमाणित तथ्यों के बीच अंतर बनाए रखना आवश्यक है। मतदाता सूची में नाम हटाया जाना अपने आप में चुनावी धांधली का प्रमाण नहीं है, लेकिन यदि पात्र मतदाता गलत तरीके से सूची से बाहर हो जाते हैं, तो उनके लोकतांत्रिक अधिकारों की रक्षा करना प्रशासन की जिम्मेदारी है।
रॉयटर्स की 10 अक्टूबर की रिपोर्ट के अनुसार, पुनरीक्षण प्रक्रिया के दौरान लगभग 13 करोड़ मतदाता प्रविष्टियां हटाई गई थीं। निर्वाचन आयोग के आंकड़ों के हवाले से रिपोर्ट में बताया गया कि इनमें लगभग 6.3 करोड़ ऐसे लोग थे, जिनके दूसरे स्थान पर चले जाने की जानकारी थी, तीन करोड़ ऐसे लोग थे जिनका पता नहीं चल पाया और 2.8 करोड़ मृत व्यक्तियों के नाम शामिल थे। ये श्रेणियां कुल आंकड़े का बड़ा हिस्सा समझाती हैं, लेकिन इनसे अकेले यह साबित नहीं होता कि प्रत्येक विलोपन सही था या किसी विशेष समूह को जानबूझकर निशाना बनाया गया। निर्वाचन आयोग के अनुसार, यदि किसी पात्र मतदाता का नाम गलत तरीके से हटाया गया है, तो वह दोबारा पंजीकरण करा सकता है। विवाद का समाधान पारदर्शी आंकड़ों, प्रभावी आपत्ति प्रक्रिया और स्वतंत्र समीक्षा से ही संभव है।
इसी पृष्ठभूमि में संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार कार्यालय ने 10 अक्टूबर को दिल्ली में प्रदर्शन से पहले और उसके दौरान प्रदर्शनकारियों, आंदोलन के नेताओं, नागरिक समाज के सदस्यों, वकीलों तथा पत्रकारों को बड़ी संख्या में हिरासत में लिए जाने की खबरों पर चिंता व्यक्त की। कार्यालय के प्रवक्ता थामिन अल-खीतान ने अधिकारियों से शांतिपूर्ण सभा के अधिकार का पूर्ण सम्मान करने, कानून प्रवर्तन के दौरान अधिकतम संयम बरतने और हिरासत में लिए गए लोगों के संबंध में कानून के अनुरूप कार्रवाई करने का आग्रह किया। संयुक्त राष्ट्र ने यह भी कहा कि शांतिपूर्ण प्रदर्शनों पर प्रतिबंध लगाने के लिए आवश्यकता और आनुपातिकता की कसौटी पूरी होनी चाहिए। उसका रुख यह था कि सार्वजनिक व्यवस्था बनाए रखने की जिम्मेदारी के साथ नागरिकों के मौलिक अधिकारों की रक्षा भी जरूरी है।
भारत ने इस टिप्पणी को स्वीकार करने के बजाय कड़ा कूटनीतिक जवाब दिया। विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने 11 अक्टूबर को कहा कि भारत दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र है, जहां शांतिपूर्ण सभा का अधिकार संविधान से संरक्षित है और स्वतंत्र न्यायपालिका, मजबूत संस्थाओं तथा स्वतंत्र मीडिया से उसे समर्थन मिलता है। मंत्रालय के अनुसार, प्रत्येक लोकतंत्र में यह अधिकार सार्वजनिक व्यवस्था और सुरक्षा बनाए रखने की उचित शर्तों के अधीन होता है। भारत ने कहा कि कानून प्रवर्तन एजेंसियां कानून के अनुसार काम करती हैं और नागरिकों के पास अपनी शिकायतों के निवारण के लिए न्यायालयों का रास्ता खुला है। इसी आधार पर विदेश मंत्रालय ने संयुक्त राष्ट्र कार्यालय की चिंता को अनुचित और भारत के आंतरिक मामलों में अस्वीकार्य हस्तक्षेप बताया।
भारत के जवाब का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा संयुक्त राष्ट्र पर लगाया गया दोहरे मानदंड का आरोप था। विदेश मंत्रालय ने कहा कि मानवाधिकार कार्यालय सार्वजनिक टिप्पणियों के मामले में अत्यधिक चयनात्मक रवैया अपनाता है। मंत्रालय के अनुसार, भारत के पड़ोसी देशों में विरोध प्रदर्शनों के दौरान हुई हिंसक कार्रवाइयों और संयुक्त राष्ट्र कार्यालय के अपने आसपास की कानून प्रवर्तन कार्रवाइयों पर वैसी सार्वजनिक टिप्पणियां नहीं दिखाई देतीं। भारत ने चेतावनी दी कि इस तरह का चयनात्मक व्यवहार अंतरराष्ट्रीय संस्था की विश्वसनीयता को कमजोर करता है और बहुपक्षवाद में लोगों के विश्वास को कम कर सकता है। हालांकि, भारत के इस आरोप का आकलन करने के लिए विभिन्न देशों में हुई घटनाओं, संयुक्त राष्ट्र की प्रतिक्रियाओं और संबंधित परिस्थितियों का तुलनात्मक अध्ययन आवश्यक है। केवल किसी एक घटना पर टिप्पणी होने या न होने से अपने आप दोहरे मानदंड सिद्ध नहीं हो जाते।
इस विवाद में राष्ट्रीय संप्रभुता का प्रश्न भी महत्वपूर्ण है। भारत जैसे स्वतंत्र देश की सरकार को कानून-व्यवस्था, यातायात, सुरक्षा और सार्वजनिक स्थलों के प्रबंधन के संबंध में निर्णय लेने का अधिकार है। किसी भी अंतरराष्ट्रीय संस्था की टिप्पणी को स्वतः बाध्यकारी आदेश नहीं माना जा सकता। लेकिन संप्रभुता का अर्थ यह भी नहीं है कि सरकार की प्रत्येक कार्रवाई आलोचना से परे हो जाए। भारत संयुक्त राष्ट्र का सदस्य है और उसने अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार व्यवस्था के अंतर्गत कई प्रतिबद्धताएं स्वीकार की हैं। इसलिए किसी कार्रवाई की वैधता का आकलन घरेलू कानून, संवैधानिक अधिकारों और लागू अंतरराष्ट्रीय दायित्वों के संदर्भ में किया जाना चाहिए। बाहरी आलोचना को हमेशा हस्तक्षेप मानना और घरेलू कार्रवाई को बिना परीक्षण के उचित ठहराना, दोनों ही दृष्टिकोण व्यापक बहस को सीमित कर सकते हैं।
भारत के संविधान का अनुच्छेद 19(1)(क) नागरिकों को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और अनुच्छेद 19(1)(ख) शांतिपूर्वक तथा बिना हथियार एकत्र होने का अधिकार देता है। वहीं, अनुच्छेद 19(2) और 19(3) के अंतर्गत निर्धारित आधारों पर इन अधिकारों पर उचित प्रतिबंध लगाए जा सकते हैं। इसका अर्थ है कि प्रदर्शन करने का अधिकार असीमित नहीं है, लेकिन प्रतिबंध भी मनमाने नहीं हो सकते। प्रशासन को यह स्पष्ट करना होता है कि किसी सभा पर रोक क्यों आवश्यक थी, प्रतिबंध का दायरा कितना था और क्या कम कठोर उपायों से भी सार्वजनिक व्यवस्था बनाए रखी जा सकती थी। यही वह कसौटी है जिस पर दिल्ली की कार्रवाई का निष्पक्ष मूल्यांकन किया जाना चाहिए।
इस दृष्टि से हिरासत में लिए गए लोगों की संख्या भी जांच का विषय है। 2,400 लोगों को हिरासत में लेने का आंकड़ा अपने आप में यह साबित नहीं करता कि पुलिस ने गैरकानूनी कार्रवाई की, क्योंकि परिस्थितियां, निषेधाज्ञाएं और प्रत्येक व्यक्ति की भूमिका अलग-अलग हो सकती है। उसी तरह, अधिकांश लोगों को उसी रात रिहा कर दिया जाना भी इस प्रश्न का स्वतः उत्तर नहीं है कि हिरासत आवश्यक और आनुपातिक थी या नहीं। प्रत्येक मामले में हिरासत का कानूनी आधार, उसकी अवधि, व्यक्ति को दी गई जानकारी और उपलब्ध न्यायिक उपचार महत्वपूर्ण हैं। पत्रकारों तथा वकीलों की भूमिका विशेष रूप से संवेदनशील होती है, क्योंकि पत्रकार घटनाओं की जानकारी सार्वजनिक करते हैं और वकील कानूनी सहायता उपलब्ध कराते हैं। रॉयटर्स ने बताया कि प्रदर्शन की रिपोर्टिंग कर रहे कुछ पत्रकारों को भी हिरासत में लिया गया था। 11 अक्टूबर को उच्चतम न्यायालय में सरकार ने आश्वासन दिया कि वकीलों और पत्रकारों को अपना काम करने से नहीं रोका जाएगा।
संयुक्त राष्ट्र की भूमिका पर भी इसी तरह प्रश्न पूछे जा सकते हैं। मानवाधिकार कार्यालय का दायित्व दुनिया भर में अधिकारों की रक्षा के लिए आवाज उठाना है, लेकिन उसकी विश्वसनीयता इस बात से मजबूत होती है कि वह समान परिस्थितियों में समान सिद्धांतों का उपयोग करे। यदि किसी देश में प्रदर्शनकारियों के खिलाफ बल प्रयोग होता है, तो उसकी जांच और प्रतिक्रिया में पारदर्शिता होनी चाहिए। यदि किसी अन्य देश में भी ऐसी घटना होती है, तो वहां भी निष्पक्षता और संयम की मांग की जानी चाहिए। साथ ही, यह भी ध्यान रखना होगा कि प्रत्येक घटना की परिस्थितियां अलग होती हैं और संयुक्त राष्ट्र की हर प्रतिक्रिया का स्वरूप समान होना जरूरी नहीं। किसी संस्था के चयनात्मक व्यवहार का आरोप तथ्यों, तुलनात्मक रिकॉर्ड और स्पष्ट मानदंडों के आधार पर परखा जाना चाहिए, न कि केवल राजनीतिक असहमति के आधार पर।
दिल्ली की घटना ने भारत की लोकतांत्रिक संस्थाओं के सामने भी चुनौती रखी है। मतदाता सूची की विश्वसनीयता सुनिश्चित करना निर्वाचन आयोग की जिम्मेदारी है, कानून-व्यवस्था बनाए रखना पुलिस का दायित्व है और नागरिकों के अधिकारों की रक्षा करना न्यायपालिका का महत्वपूर्ण कार्य है। राजनीतिक दलों को आरोपों के समर्थन में प्रमाण प्रस्तुत करने चाहिए, जबकि सरकार और निर्वाचन आयोग को मतदाता सूची में बदलाव की प्रक्रिया के बारे में स्पष्ट तथा सत्यापन योग्य जानकारी उपलब्ध करानी चाहिए। यदि लगभग 13 करोड़ प्रविष्टियों के विलोपन को लेकर विवाद है, तो आंकड़ों का वर्गीकरण, राज्यवार विवरण, आपत्तियों के निपटारे की स्थिति और पात्र मतदाताओं के पुनः पंजीकरण के परिणाम सार्वजनिक चर्चा को अधिक तथ्यपरक बना सकते हैं।
अंततः, दिल्ली के प्रदर्शन पर संयुक्त राष्ट्र की टिप्पणी और भारत के कड़े प्रत्युत्तर को केवल कूटनीतिक टकराव के रूप में देखना पर्याप्त नहीं है। भारत का संप्रभुता और निष्पक्षता का प्रश्न महत्वपूर्ण है, जबकि शांतिपूर्ण प्रदर्शन, वैध हिरासत और नागरिक स्वतंत्रता से जुड़े सवाल भी उतने ही प्रासंगिक हैं। संयुक्त राष्ट्र को अपने मानदंडों की निरंतरता और निष्पक्षता प्रदर्शित करनी चाहिए, वहीं भारतीय अधिकारियों को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि सार्वजनिक व्यवस्था के नाम पर लगाए गए प्रतिबंध कानूनसम्मत, आवश्यक और आनुपातिक हों। लोकतंत्र की वास्तविक मजबूती आलोचना को दबाने या आलोचना करने वाली संस्था को खारिज करने में नहीं, बल्कि पारदर्शिता, जवाबदेही और निष्पक्ष जांच के माध्यम से तथ्यों को सामने लाने में है। यदि दोनों पक्ष समान मानकों, प्रमाणों और संवाद को प्राथमिकता दें, तो यह विवाद टकराव के बजाय लोकतांत्रिक जवाबदेही को मजबूत करने का अवसर बन सकता है।
