द ग्रेट इंडियन गृह-देवासुर संग्राम: रिश्तों की रणभूमि में बहू अकेली
टीवी पर रामायण या महाभारत शुरू होते ही घर में श्रद्धा का वातावरण बन जाता है।

भारती वर्मा, टीजीटी हिंदी, दिल्ली
सुनिए… आपने देवासुर संग्राम की कथा तो जरूर सुनी होगी। एक ओर देवता, दूसरी ओर असुर; एक ओर अमृत की चाह, दूसरी ओर सत्ता और विजय की होड़। पुराणों में यह युद्ध ब्रह्मांडीय संघर्ष का प्रतीक है, लेकिन अगर आप भारतीय परिवारों के कुछ ड्रॉइंग रूमों में ध्यान से झांकें तो लगेगा कि देवासुर संग्राम आज भी जारी है। फर्क सिर्फ इतना है कि अब शंख, गदा और त्रिशूल की जगह ताने, नसीहतें, घूरती निगाहें और भावनात्मक ब्रह्मास्त्र इस्तेमाल होते हैं।
टीवी पर रामायण या महाभारत शुरू होते ही घर में श्रद्धा का वातावरण बन जाता है। मगर उसी समय घर की बहू के मन में एक अलग ही धारावाहिक चल रहा होता है—‘गृह-देवासुर संग्राम’। उसे लगता है कि पूरा ससुराल एक तरफ है और वह अकेली दूसरी तरफ। सुबह की पहली चाय से लेकर रात की आखिरी रसोई तक, हर काम किसी नए युद्ध का शंखनाद बन जाता है।
इस युद्ध में अगर किसी एक व्यक्ति को ‘देवता’ की भूमिका मिली है तो वह अक्सर बहू होती है—कम से कम उसकी अपनी कल्पना में। बाकी पात्र परिस्थितियों के अनुसार असुर, गुरु, नारद, कुंभकर्ण और मायावी राक्षसों में बदलते रहते हैं। हालांकि असली जीवन में रिश्तों को इस तरह देव-असुर के खांचों में बांटना उचित नहीं, लेकिन व्यंग्य की दुनिया में यही तो मजा है।
समुद्र मंथन का प्रसंग याद कीजिए। देव और असुर दोनों ने मिलकर समुद्र मथा और अंततः अमृत निकला। लेकिन गृहस्थी के समुद्र मंथन में नियम कुछ अलग दिखाई देते हैं। बहू तीन घंटे रसोई में खड़ी होकर पकवान तैयार करे और कोई एक व्यंजन शानदार बन जाए तो परिवार की सामूहिक घोषणा होती है—‘हमारे घर के खानदान में ही स्वाद है।’ बेटे की तारीफ होगी, परिवार की परंपरा की चर्चा होगी और रसोई में मेहनत करने वाली महिला का नाम कहीं पीछे छूट जाएगा।
लेकिन यदि उसी थाली में सब्जी में नमक थोड़ा अधिक हो जाए, रोटी कुछ मोटी रह जाए या चाय अपेक्षा से थोड़ी ठंडी हो जाए, तो अचानक समुद्र से विष निकल आता है और नीलकंठ बनने की जिम्मेदारी बहू की हो जाती है—‘मायके में खाना बनाना नहीं सीखा क्या?’ एक गलती व्यक्ति की, मगर दोष पूरे संस्कारों का!
यही घरेलू व्यंग्य का सबसे तीखा पक्ष है। अच्छे परिणाम का श्रेय सामूहिक और गलती की जिम्मेदारी व्यक्तिगत। यह प्रवृत्ति केवल ससुराल तक सीमित नहीं है; किसी भी परिवार में जहां काम का बंटवारा असमान हो और अपेक्षाएं एकतरफा हों, वहां ऐसी स्थितियां पैदा हो सकती हैं।
फिर आती है संजीवनी बूटी की कथा। लक्ष्मण मूर्छित हुए तो हनुमान संजीवनी लेने निकल पड़े और पूरा पर्वत ही उठा लाए। गृहस्थी में किसी प्रिय सदस्य को जरा-सी छींक आ जाए तो कभी-कभी घर का माहौल ऐसा हो जाता है जैसे तत्काल राष्ट्रीय स्वास्थ्य आपातकाल घोषित हो गया हो। काढ़ा चाहिए, हल्दी वाला दूध चाहिए, दवा चाहिए, पैर दबाने हैं और आराम की पूरी व्यवस्था चाहिए। बहू दौड़ती रहती है और खुद को हनुमान जी के आधुनिक संस्करण की तरह महसूस करती है।
लेकिन वही बहू बीमार पड़ जाए तो कहानी बदल जाती है। ‘हमारे जमाने में तो हम इतने बुखार में भी काम करते थे’, ‘आजकल की लड़कियों में सहनशक्ति नहीं है’ और ‘थोड़ी-सी तकलीफ में आराम चाहिए’ जैसी टिप्पणियां उसकी बीमारी को भी परीक्षा में बदल देती हैं। यहां व्यंग्य के पीछे एक गंभीर सवाल छिपा है—क्या परिवार में देखभाल का अधिकार सभी के लिए समान है?
अब आइए गुरु शुक्राचार्य के पास। व्यंग्य में सास के पास ऐसी स्मृति-शक्ति होती है कि परिवार की कोई पुरानी घटना कभी समाप्त ही नहीं होती। तीन वर्ष पहले टूटे गिलास या दिवाली पर गिरे बर्तन से लेकर वर्षों पुरानी छोटी-सी भूल तक, सब कुछ आवश्यकता पड़ते ही पुनर्जीवित हो सकता है। मानो घर में ‘मृतसंजीवनी विद्या’ का निजी संग्रह हो।
और यदि घर में देवर जी हैं तो उनके लिए कुंभकर्ण का रूपक अपने आप तैयार हो जाता है। दोपहर तक नींद, जागते ही नाश्ते की मांग और उसके बाद भरपूर सेवा। व्यंग्य की दुनिया में यह दृश्य हास्यास्पद है, लेकिन वास्तविक जीवन में सवाल फिर वही है—क्या घर के सभी सदस्यों के घरेलू श्रम को समान महत्व मिलता है?
ननद को नारद मुनि का रूपक देना भी भारतीय घरेलू व्यंग्य की पुरानी परंपरा का हिस्सा है। एक फोन कॉल, थोड़ी-सी सूचना, कुछ अतिरिक्त मसाला और घर की शांति अचानक बहस में बदल जाती है। हालांकि यहां भी असली निशाना किसी एक रिश्ते को दोषी ठहराना नहीं, बल्कि उस मानसिकता पर है जिसमें संवाद के बजाय चुगली, अनुमान और पक्षधरता रिश्तों को प्रभावित करने लगते हैं।
फिर आते हैं मायावी राक्षस। डिजिटल युग में उनका रूप भी आधुनिक हो गया है। ऑनलाइन खरीदारी, मोबाइल भुगतान, बैंकिंग ऐप, टिकट बुकिंग या कोई तकनीकी काम हो तो अचानक घर की बहू डिजिटल युग की विशेषज्ञ घोषित कर दी जाती है—‘तुम कर दो न, तुम्हें तो सब आता है।’ काम पूरा होते ही वही विशेषज्ञ फिर सामान्य घरेलू सदस्य बन जाती है।
सबसे शक्तिशाली अस्त्र है भावनात्मक ब्रह्मास्त्र। तर्क समाप्त होने पर आंसू, त्याग और पुराने उपकारों का संदर्भ सामने आ जाता है—‘हमने अपनी पूरी जिंदगी बच्चों के लिए लगा दी।’ ऐसी स्थिति में बहस का विषय कुछ भी हो, बातचीत तुरंत भावनात्मक न्यायालय में बदल जाती है। और परिवार का वह सदस्य जो निष्पक्ष रहने का प्रयास कर रहा था, अचानक किसी एक पक्ष को समझाने के लिए बहू के सामने खड़ा हो जाता है।
व्यंग्य में पति को ‘विष्णु जी’ कहना इसलिए भी मजेदार है कि वह अक्सर पूरे युद्ध का दर्शक बना रहता है। जब तक समस्या उससे सीधे जुड़ी न हो, वह सोफे पर बैठकर रिमोट के साथ ध्यानमग्न रह सकता है। लेकिन जैसे ही विवाद बढ़ता है, उसका पहला वाक्य होता है—‘तुम मां से ऐसे बात क्यों करती हो?’
यहां हास्य के पीछे एक महत्वपूर्ण सामाजिक प्रश्न है। परिवार में मध्यस्थता का अर्थ किसी एक पक्ष को चुप कराना नहीं, बल्कि दोनों पक्षों को सुनना होना चाहिए। रिश्तों में निष्पक्षता का अर्थ भावनाहीन होना नहीं, बल्कि न्यायपूर्ण संवाद कायम करना है।
गृह-देवासुर संग्राम की सबसे बड़ी विडंबना यह है कि इसमें कोई स्थायी देवता और स्थायी असुर नहीं होते। परिस्थितियां बदलते ही भूमिकाएं भी बदल सकती हैं। आज जो व्यक्ति शिकायत कर रहा है, कल वही किसी दूसरे के लिए शिकायत का कारण बन सकता है। इसलिए परिवार को देव और असुर की स्थायी श्रेणियों में बांटने के बजाय यह समझना जरूरी है कि रिश्ते सहयोग से चलते हैं, युद्ध से नहीं।
पुराणों की कथाएं हमें प्रतीकों के माध्यम से जीवन की गहरी बातें समझाती हैं। समुद्र मंथन बताता है कि मंथन से अमृत के साथ विष भी निकलता है। गृहस्थ जीवन भी ऐसा ही मंथन है। इसमें प्रेम है तो मतभेद भी हैं, त्याग है तो अपेक्षाएं भी हैं, जिम्मेदारियां हैं तो अधिकार भी हैं। समस्या तब पैदा होती है जब श्रेय किसी एक का और दोष किसी दूसरे का स्थायी अधिकार बना दिया जाए।
इसलिए आधुनिक गृहस्थी की असली जरूरत किसी एक पक्ष की विजय नहीं, बल्कि जिम्मेदारियों और सम्मान का संतुलन है। रसोई केवल बहू की जिम्मेदारी नहीं, बीमारी केवल महिला की परीक्षा नहीं, बुजुर्गों का सम्मान केवल एक व्यक्ति का कर्तव्य नहीं और बच्चों की देखभाल केवल मां का काम नहीं। परिवार तब परिवार बनता है जब काम, सम्मान और संवेदना साझा होते हैं।
कहानी की हमारी व्यंग्यात्मक नायिका अंत में बेलन को सुदर्शन चक्र समझकर युद्ध का शंखनाद करने की कल्पना करती है। मगर शायद असली विजय बेलन चलाने में नहीं, बेलन को प्रतीक बनाकर संवाद शुरू करने में है। हर घर में युद्ध का अंत किसी के हारने से नहीं, बल्कि सबके थोड़ा-थोड़ा बदलने से हो सकता है।
आखिर देवासुर संग्राम की कथाओं में भी संघर्ष के बाद व्यवस्था की स्थापना होती है। गृहस्थी में भी यही होना चाहिए। हर दिन नया युद्ध शुरू करने के बजाय यदि परिवार एक-दूसरे की मेहनत को पहचान ले, बीमारी में समान संवेदना रखे, गलती पर अपमान के बजाय सुधार का अवसर दे और रिश्तों में संवाद को प्राथमिकता दे, तो शायद घर को रणभूमि बनने की जरूरत ही न पड़े।
और हां… अगर फिर भी कभी गृह-देवासुर संग्राम छिड़ जाए तो याद रखिए—रावण के दस सिर हों या घरेलू तानों के सौ रूप, विजय किसी एक की नहीं, अंततः उसी परिवार की होती है जो युद्ध से ऊपर उठकर रिश्तों को बचा लेता है।
