चार साल में 52 चीते, भारत में नई पीढ़ी ने मजबूत की जंगलों में वापसी की उम्मीद
परियोजना की शुरुआत नामीबिया से आए आठ चीतों से हुई। इसके बाद फरवरी 2023 में दक्षिण अफ्रीका से 12 चीते भारत लाए गए।

राजीव त्रिपाठी
भारत में विलुप्त हो चुके चीते को फिर से बसाने के लिए शुरू किया गया ‘प्रोजेक्ट चीता’ सितंबर 2026 में चार वर्ष पूरे कर चुका है। 17 सितंबर 2022 को नामीबिया से आठ चीतों के कूनो राष्ट्रीय उद्यान पहुंचने के साथ शुरू हुई इस महत्वाकांक्षी परियोजना ने चार वर्षों में कई महत्वपूर्ण पड़ाव पार किए हैं। भारत में चीतों की कुल संख्या बढ़कर 52 हो गई है। इनमें 32 चीते भारत की धरती पर जन्मे हैं। अधिकांश चीते मध्य प्रदेश के कूनो राष्ट्रीय उद्यान में हैं, जबकि कुछ गांधी सागर वन्यजीव अभयारण्य में भी बसाए गए हैं।
प्रोजेक्ट चीता को किसी बड़े मांसाहारी वन्यजीव के अंतरमहाद्वीपीय स्थानांतरण और पुनर्स्थापना की दुनिया की सबसे महत्वपूर्ण परियोजनाओं में माना जा रहा है। इसका उद्देश्य केवल दूसरे देशों से चीते लाकर भारत में रखना नहीं, बल्कि देश में उनकी ऐसी स्वतंत्र और प्रजननक्षम आबादी तैयार करना है, जो लंबे समय तक प्राकृतिक परिस्थितियों में कायम रह सके।
परियोजना की शुरुआत नामीबिया से आए आठ चीतों से हुई। इसके बाद फरवरी 2023 में दक्षिण अफ्रीका से 12 चीते भारत लाए गए। 2026 में बोत्सवाना से भी नौ चीते भारत पहुंचे। इस तरह अलग-अलग अफ्रीकी आबादियों से चीतों को भारत लाने का उद्देश्य संख्या बढ़ाने के साथ आनुवंशिक विविधता को मजबूत करना भी रहा है।
चार वर्षों की सबसे बड़ी उपलब्धि भारत में जन्मे 32 चीतों की संख्या है। यह आंकड़ा बताता है कि भारतीय परिस्थितियों में चीते प्रजनन कर रहे हैं। कूनो में कई मादा चीताओं ने शावकों को जन्म दिया और अब भारत में जन्मी पीढ़ी परियोजना का महत्वपूर्ण हिस्सा बन चुकी है। अप्रैल 2026 में भारत में जन्मी एक मादा चीता द्वारा कूनो के जंगल में चार शावकों को जन्म देना परियोजना के लिए विशेष उपलब्धि माना गया। यह घटना इस बात का संकेत है कि भारत में जन्मी चीता पीढ़ी भी प्राकृतिक जंगल में प्रजनन की क्षमता विकसित कर रही है।
शावकों की जीवित रहने की दर भी परियोजना के लिए महत्वपूर्ण संकेतक है। उपलब्ध आकलनों के अनुसार भारत में चीता शावकों की जीवित रहने की दर करीब 65 से 68 प्रतिशत के बीच रही है। यह आंकड़ा कई अफ्रीकी क्षेत्रों में दर्ज शावक जीवित रहने की दर के मुकाबले उत्साहजनक है। हालांकि पूरे अफ्रीका के लिए एक ही औसत दर मानना वैज्ञानिक रूप से उचित नहीं होगा, क्योंकि नामीबिया, दक्षिण अफ्रीका और अन्य क्षेत्रों में परिस्थितियों के अनुसार शावकों की जीवित रहने की दर अलग-अलग रहती है।
चीतों की आबादी में वृद्धि को केवल संख्या के आधार पर देखना पर्याप्त नहीं है। किसी पुनर्वास परियोजना की वास्तविक सफलता इस बात से तय होती है कि जन्मे शावक वयस्क बनें, उनका प्रजनन हो, वे स्वतंत्र रूप से शिकार कर सकें और समय के साथ मानवीय सहायता पर उनकी निर्भरता कम होती जाए। इस दृष्टि से भारत में पैदा हुए 32 चीतों का महत्व काफी बड़ा है।
कूनो राष्ट्रीय उद्यान वर्तमान में परियोजना का मुख्य केंद्र है। यहां चीते सॉफ्ट-रिलीज बाड़ों और खुले जंगल दोनों में रखे जा रहे हैं। खुले जंगल में छोड़े गए चीते स्वतंत्र रूप से अपने क्षेत्र में विचरण करते हैं, शिकार करते हैं और प्राकृतिक व्यवहार प्रदर्शित करते हैं। दूसरी ओर, छोटे शावकों तथा नए स्थानांतरित चीतों को चरणबद्ध तरीके से प्राकृतिक परिस्थितियों के अनुकूल बनाया जा रहा है।
परियोजना का अगला बड़ा कदम कूनो से बाहर चीतों की आबादी का विस्तार है। गांधी सागर वन्यजीव अभयारण्य में चीता पुनर्वास की प्रक्रिया शुरू हो चुकी है। भविष्य में मध्य प्रदेश के नौरादेही वन्यजीव अभयारण्य और गुजरात के बन्नी घासभूमि क्षेत्र जैसे संभावित स्थलों पर भी चीतों को बसाने की दिशा में काम किया जा सकता है। इससे एक ही क्षेत्र पर पूरी आबादी की निर्भरता कम होगी और अलग-अलग स्थानों पर चीता आबादी विकसित की जा सकेगी।
यह विस्तार इसलिए भी जरूरी है क्योंकि किसी एक क्षेत्र में बीमारी, प्राकृतिक आपदा, मानव-वन्यजीव संघर्ष या भोजन की कमी जैसी समस्या होने पर पूरी आबादी प्रभावित हो सकती है। अलग-अलग सुरक्षित क्षेत्रों में आबादी विकसित होने से जोखिम का विभाजन होगा और भविष्य में भारत में चीतों की एक व्यापक मेटापॉपुलेशन तैयार की जा सकेगी।
चीतों के भविष्य का एक महत्वपूर्ण आधार उनका भोजन है। चीते मुख्य रूप से मध्यम आकार के शाकाहारी जीवों पर निर्भर रहते हैं। इसलिए कूनो, गांधी सागर और संभावित नए क्षेत्रों में चीतल, चिंकारा, नीलगाय तथा अन्य शिकार प्रजातियों की पर्याप्त संख्या बनाए रखना आवश्यक होगा। यदि शिकार आधार कमजोर होता है तो केवल सुरक्षित जंगल और पानी उपलब्ध होने से चीता आबादी लंबे समय तक नहीं टिक सकती।
घासभूमि संरक्षण भी परियोजना के भविष्य से सीधे जुड़ा है। चीता खुले और मिश्रित घासभूमि वाले परिदृश्य में बेहतर ढंग से शिकार कर सकता है। इसलिए प्रोजेक्ट चीता को केवल एक वन्यजीव संरक्षण कार्यक्रम के रूप में नहीं, बल्कि घासभूमि और खुले प्राकृतिक पारिस्थितिक तंत्र के संरक्षण से जोड़कर देखना जरूरी है।
सरकार अब परियोजना को अगले चरण में ले जाने के लिए निगरानी व्यवस्था को भी मजबूत कर रही है। चीतों की गतिविधियों पर रेडियो कॉलर, जीपीएस आधारित निगरानी और कैमरा ट्रैप के माध्यम से नजर रखी जाती है। इससे उनके क्षेत्र, आवागमन, शिकार, स्वास्थ्य और प्रजनन संबंधी जानकारी प्राप्त होती है। किसी चीते की गतिविधि में असामान्य बदलाव आने पर वन्यजीव विशेषज्ञ और निगरानी दल तत्काल हस्तक्षेप कर सकते हैं।
स्थानीय समुदायों की भूमिका भी भविष्य में महत्वपूर्ण रहेगी। कूनो और आसपास के गांवों में लोगों को चीतों के व्यवहार, उनकी मौजूदगी और मानव-वन्यजीव संघर्ष से बचाव के बारे में जागरूक करना जरूरी है। स्थानीय लोगों को संरक्षण प्रक्रिया का भागीदार बनाने से परियोजना को सामाजिक आधार मिल सकता है।
प्रोजेक्ट चीता की शुरुआत में कुछ चीतों की मौत ने गंभीर सवाल खड़े किए थे। नई जगह पर स्थानांतरण, जलवायु, संक्रमण, प्राकृतिक परिस्थितियों में अनुकूलन और अन्य कारणों से कुछ चीतों की मृत्यु हुई। इससे परियोजना की रणनीति और प्रबंधन पर बहस भी हुई। लेकिन इसके साथ यह भी तथ्य है कि चार वर्षों में भारत में 32 चीतों का जन्म हुआ और आबादी 52 तक पहुंची है। इसलिए परियोजना का मूल्यांकन केवल शुरुआती मृत्यु के आधार पर या केवल वर्तमान संख्या के आधार पर करना पर्याप्त नहीं होगा।
अब परियोजना के सामने सबसे बड़ी चुनौती संख्या बढ़ाना नहीं, बल्कि स्थायी और स्वतंत्र चीता आबादी तैयार करना है। भारत में जन्मे चीतों को जंगल में सफलतापूर्वक स्थापित करना, उनके वयस्क होने और प्रजनन की निगरानी करना तथा अलग-अलग क्षेत्रों में आबादी विकसित करना आने वाले वर्षों की प्राथमिकता होगी।
आनुवंशिक विविधता भी इस पूरी प्रक्रिया का अहम हिस्सा है। नामीबिया, दक्षिण अफ्रीका और बोत्सवाना से चीतों को लाने का उद्देश्य अलग-अलग आनुवंशिक समूहों को भारत की आबादी से जोड़ना है। भविष्य में आवश्यकता के अनुसार नए चीतों को लाने और मौजूदा आबादी के आनुवंशिक स्वास्थ्य की निगरानी पर भी ध्यान देना होगा।
चार वर्ष बाद प्रोजेक्ट चीता एक ऐसे मोड़ पर खड़ा है जहां शुरुआती पुनर्वास चरण से आगे बढ़कर स्थायी संरक्षण का दौर शुरू हो रहा है। 52 चीते और भारत में जन्मे 32 चीते निश्चित रूप से महत्वपूर्ण आंकड़े हैं, लेकिन असली उपलब्धि तब होगी जब आने वाली पीढ़ियां बिना लगातार मानवीय सहायता के भारतीय जंगलों में अपना जीवन चक्र पूरा करेंगी।
भारत में चीते का भविष्य अब केवल कूनो की सीमा तक सीमित नहीं दिखाई देता। कूनो के साथ गांधी सागर और संभावित रूप से नौरादेही तथा बन्नी जैसे नए क्षेत्रों में आबादी का विस्तार, पर्याप्त शिकार आधार, स्वस्थ घासभूमि, वैज्ञानिक निगरानी, आनुवंशिक विविधता और स्थानीय समुदायों की भागीदारी इस भविष्य की नींव बन सकती है।
चार वर्षों में विदेशी धरती से आए चीतों ने भारत में नई पीढ़ी को जन्म दिया है। अब अगले कुछ वर्ष यह तय करेंगे कि यह नई पीढ़ी भारतीय जंगलों में कितनी मजबूती से अपना स्थान बनाती है। यदि प्रजनन, शावक जीवित रहने, प्राकृतिक व्यवहार और सुरक्षित आवास के सभी मानक लगातार मजबूत होते हैं, तो प्रोजेक्ट चीता भारत में विलुप्त प्रजाति की वापसी से आगे बढ़कर दीर्घकालिक वन्यजीव संरक्षण का बड़ा उदाहरण बन सकता है।
