ब्रिक्स में भारत का बढ़ता वैश्विक प्रभाव
ब्रिक्स का विस्तार केवल नए देशों को सदस्य बनाने की प्रक्रिया नहीं है। यह विकासशील देशों की बढ़ती आर्थिक और राजनीतिक शक्ति का भी संकेत...

✍️ कैलाश चंद्र
नई दिल्ली में 12-13 सितंबर 2026 को आयोजित 18वां ब्रिक्स शिखर सम्मेलन केवल राष्ट्राध्यक्षों और शासनाध्यक्षों की एक औपचारिक बैठक नहीं था। भारत की अध्यक्षता में हुआ यह सम्मेलन बदलती विश्व व्यवस्था में भारत की बढ़ती कूटनीतिक भूमिका और ग्लोबल साउथ की आकांक्षाओं को स्वर देने की उसकी क्षमता का महत्वपूर्ण उदाहरण रहा। विश्व व्यवस्था एकध्रुवीय और द्विध्रुवीय संरचनाओं से आगे बढ़कर बहुध्रुवीयता की ओर बढ़ रही है। ऐसे समय में भारत ने ब्रिक्स मंच का उपयोग केवल अपनी कूटनीतिक उपस्थिति दर्ज कराने के लिए नहीं, बल्कि विकासशील देशों की प्राथमिकताओं को वैश्विक विमर्श के केंद्र में लाने के लिए किया।
भारत की ब्रिक्स अध्यक्षता में लचीलापन, नवाचार, सहयोग और सतत विकास को प्रमुख आधार बनाया गया। आतंकवाद, व्यापार, स्थानीय मुद्राओं में लेन-देन, डिजिटल सार्वजनिक अवसंरचना, कृत्रिम बुद्धिमत्ता, स्वास्थ्य, इंडस्ट्री 4.0 और वैश्विक वित्तीय संस्थाओं में सुधार जैसे विषयों को व्यापक सहयोग के एजेंडे से जोड़ा गया। इससे ब्रिक्स को केवल राजनीतिक समूह के बजाय विकास और व्यावहारिक अंतरराष्ट्रीय सहयोग के मंच के रूप में आगे बढ़ाने का प्रयास दिखाई दिया।
किसी भी अंतरराष्ट्रीय संगठन की अध्यक्षता की सफलता केवल बैठकों की संख्या से नहीं मापी जाती। वास्तविक सफलता इस बात से तय होती है कि अध्यक्ष देश समूह की दिशा और प्राथमिकताओं को कितना प्रभावित कर पाया। भारत की अध्यक्षता के दौरान 30 शहरों में 400 से अधिक बैठकें और सहभागिता कार्यक्रम आयोजित किए गए। इससे ब्रिक्स की गतिविधियों का भारत के सामाजिक, आर्थिक, तकनीकी और संस्थागत क्षेत्रों से व्यापक जुड़ाव बना। भारत की महत्वपूर्ण कूटनीतिक उपलब्धियों में यह बात शामिल है कि उसने ब्रिक्स को किसी पश्चिम-विरोधी मंच के रूप में सीमित करने के बजाय समाधान आधारित सहयोग की दिशा में आगे बढ़ाने का प्रयास किया। भारत की विदेश नीति का मूल सिद्धांत भी यही है कि किसी एक शक्ति-शिविर के साथ स्थायी रूप से जुड़ने के बजाय सभी प्रमुख शक्तियों के साथ सहयोग किया जाए, लेकिन निर्णय राष्ट्रीय हितों के आधार पर लिए जाएं।
भारत के लिए आतंकवाद केवल कूटनीतिक विषय नहीं, बल्कि प्रत्यक्ष राष्ट्रीय सुरक्षा का प्रश्न है। पहलगाम जैसे आतंकी हमलों के बाद आतंकवाद, उसकी वित्तीय व्यवस्था, सुरक्षित ठिकानों और सीमा पार नेटवर्क के खिलाफ अंतरराष्ट्रीय सहयोग का महत्व और बढ़ गया है। भारत लगातार कहता रहा है कि आतंकवाद को अच्छे और बुरे आतंकवाद में विभाजित नहीं किया जा सकता। आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई केवल राजनीतिक निंदा तक सीमित नहीं रहनी चाहिए। इसके लिए आतंकवादी वित्तपोषण, डिजिटल नेटवर्क, हथियार और मादक पदार्थों की तस्करी, भर्ती और कट्टरपंथीकरण के खिलाफ समन्वित कार्रवाई आवश्यक है। ब्रिक्स के भीतर बनी सहमति को यदि ठोस सुरक्षा सहयोग में बदला जा सके, तो यह भारत के लिए महत्वपूर्ण कूटनीतिक उपलब्धि होगी।
ब्रिक्स का विस्तार केवल नए देशों को सदस्य बनाने की प्रक्रिया नहीं है। यह विकासशील देशों की बढ़ती आर्थिक और राजनीतिक शक्ति का भी संकेत है। भारत लंबे समय से संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद, अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष, विश्व बैंक और विश्व व्यापार संगठन जैसी संस्थाओं में विकासशील देशों के अधिक प्रतिनिधित्व की मांग करता रहा है। ग्लोबल साउथ में भारत की विश्वसनीयता केवल उसकी जनसंख्या या अर्थव्यवस्था के आकार से नहीं बनती। भारत का अपना विकास अनुभव भी इसकी बड़ी वजह है। लोकतंत्र के साथ बड़े पैमाने पर विकास, डिजिटल सार्वजनिक अवसंरचना, वित्तीय समावेशन, सस्ती दवाओं, अंतरिक्ष तकनीक और डिजिटल शासन के क्षेत्र में भारत ने ऐसे मॉडल विकसित किए हैं, जिनसे अन्य विकासशील देश सीख सकते हैं। इसलिए ग्लोबल साउथ का नेतृत्व भारत के लिए अवसर के साथ जिम्मेदारी भी है। यह नेतृत्व केवल राजनीतिक भाषणों से नहीं, बल्कि व्यावहारिक समाधान उपलब्ध कराने से मजबूत होगा।
ब्रिक्स को केवल पश्चिम-विरोधी गठबंधन के रूप में देखना रणनीतिक भूल होगी। भारत एक साथ ब्रिक्स का सदस्य है, क्वाड में सक्रिय है, जी-20 में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है, शंघाई सहयोग संगठन से जुड़ा है और रूस के साथ लंबे समय से रणनीतिक संबंध बनाए हुए है। साथ ही अमेरिका और यूरोप के साथ भी भारत के रणनीतिक एवं आर्थिक संबंध लगातार गहरे हो रहे हैं। यह भारत की रणनीतिक स्वायत्तता का व्यावहारिक रूप है। भारत किसी एक शक्ति-समूह को दूसरे से बदलना नहीं चाहता। उसका उद्देश्य अपनी आर्थिक, तकनीकी, सैन्य और कूटनीतिक क्षमता को इतना मजबूत करना है कि वह प्रत्येक प्रमुख शक्ति-केंद्र के साथ अपने राष्ट्रीय हितों के अनुसार संबंध रख सके।
ब्रिक्स में स्थानीय मुद्राओं और भुगतान प्रणालियों के बीच सहयोग की चर्चा महत्वपूर्ण है, लेकिन इसे डॉलर-आधारित व्यवस्था के तत्काल अंत के रूप में देखना उचित नहीं होगा। ब्रिक्स ने कोई साझा मुद्रा लागू नहीं की है और न ही डॉलर व्यवस्था को तुरंत समाप्त करने की घोषणा की है। व्यावहारिक लक्ष्य अंतरराष्ट्रीय व्यापार में अधिक विकल्प तैयार करना है। यदि सदस्य देश द्विपक्षीय व्यापार में अपनी मुद्राओं का अधिक इस्तेमाल करें, भुगतान प्रणालियों को जोड़ें और लेन-देन की लागत घटाएं, तो कुछ क्षेत्रों में डॉलर पर निर्भरता कम की जा सकती है। हालांकि भारत के लिए यह तभी प्रभावी होगा, जब स्थानीय मुद्रा में व्यापार के साथ निर्यात प्रतिस्पर्धा भी बढ़े। केवल भुगतान की व्यवस्था बदलने से व्यापार घाटा समाप्त नहीं होगा। भारत को अपने निर्यात की मात्रा और गुणवत्ता दोनों बढ़ानी होंगी।
भारत की डिजिटल सार्वजनिक अवसंरचना उसकी प्रमुख वैश्विक शक्तियों में उभर रही है। डिजिटल पहचान, त्वरित भुगतान, वित्तीय समावेशन और डिजिटल शासन ने बड़े पैमाने पर तकनीक के सामाजिक उपयोग की संभावनाएं प्रदर्शित की हैं। भारत के लिए अवसर केवल अपनी तकनीक दूसरे देशों को उपलब्ध कराने में नहीं, बल्कि अपने पूरे डिजिटल शासन अनुभव को साझा करने में है। डिजिटल पहचान, बैंकिंग, दूरसंचार, भुगतान, नियमन, शासन और नागरिक भागीदारी का पूरा पारिस्थितिकी तंत्र विकासशील देशों के लिए उपयोगी मॉडल बन सकता है।
भविष्य की वैश्विक शक्ति केवल सैन्य क्षमता से तय नहीं होगी। कृत्रिम बुद्धिमत्ता, जैव-प्रौद्योगिकी, स्वास्थ्य, सेमीकंडक्टर, अंतरिक्ष, ऊर्जा और इंडस्ट्री 4.0 राष्ट्रीय शक्ति के नए आधार बन रहे हैं। भारत ने ब्रिक्स सहयोग में एआई को महत्व देकर सही दिशा पकड़ी है। आवश्यकता ऐसे एआई की है जो समावेशी, सुरक्षित, विश्वसनीय और मानव-केंद्रित हो। यदि एआई का लाभ कुछ विकसित देशों और बड़ी तकनीकी कंपनियों तक सीमित रहा, तो डिजिटल असमानता आर्थिक असमानता का नया रूप बन सकती है। स्वास्थ्य के क्षेत्र में सस्ती दवाएं, वैक्सीन, चिकित्सा प्रशिक्षण और बड़े पैमाने पर स्वास्थ्य सेवाओं का अनुभव भारत को विकासशील देशों के साथ सहयोग का महत्वपूर्ण अवसर देता है। इसी तरह इंडस्ट्री 4.0, कौशल विकास, एमएसएमई, स्टार्टअप और नवाचार के क्षेत्र में सहयोग नए आर्थिक अवसर पैदा कर सकता है। भारत की वास्तविक चुनौती यह है कि वह केवल बड़ा उपभोक्ता बाजार न रहे, बल्कि बड़ी तकनीक और उच्च मूल्यवर्धित उत्पाद बनाने वाला देश बने।
ब्रिक्स का भविष्य भारत-चीन संबंधों से भी प्रभावित होगा। सीमा विवाद, व्यापार असंतुलन और रणनीतिक प्रतिस्पर्धा वास्तविकताएं हैं। इन्हें नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। लेकिन कूटनीति का अर्थ मतभेदों से इनकार करना नहीं, बल्कि उन्हें नियंत्रित करते हुए साझा हितों के क्षेत्रों में सहयोग तलाशना है। सीमा पर शांति, व्यापार, बाजार पहुंच, आपूर्ति श्रृंखला और संपर्क जैसे विषयों पर संवाद भारत के हित में हो सकता है। हालांकि संवाद को निर्भरता नहीं बनने दिया जा सकता। जहां प्रतिस्पर्धा आवश्यक है, वहां भारत को प्रतिस्पर्धा करनी होगी; जहां सहयोग संभव है, वहां सहयोग करना होगा और जहां राष्ट्रीय सुरक्षा का प्रश्न हो, वहां दृढ़ रहना होगा।
रूस के साथ भारत के रक्षा, ऊर्जा, तकनीकी और रणनीतिक संबंध महत्वपूर्ण हैं। दूसरी ओर अमेरिका और यूरोप व्यापार, निवेश, तकनीक और रणनीतिक सहयोग के महत्वपूर्ण साझेदार हैं। भारत की चुनौती किसी एक संबंध को दूसरे के विरुद्ध खड़ा करना नहीं, बल्कि सभी संबंधों को राष्ट्रीय हित के अनुरूप संतुलित करना है। यही सिद्धांत पश्चिम एशिया पर भी लागू होता है। ऊर्जा सुरक्षा, भारतीय प्रवासी, व्यापार, समुद्री मार्ग और क्षेत्रीय स्थिरता सीधे भारत के हितों से जुड़े हैं। भारत वैश्विक संघर्षों में किसी पक्ष का हिस्सा बनने के बजाय शांति और स्थिरता का समर्थन करता है, लेकिन अपने राष्ट्रीय हितों की कीमत पर नहीं।
नई दिल्ली ब्रिक्स सम्मेलन ने भारत की कूटनीतिक स्थिति को मजबूत किया है, लेकिन इसकी अंतिम सफलता सम्मेलन के मंच पर नहीं, भारतीय अर्थव्यवस्था में दिखाई देगी। चीन के साथ व्यापार असंतुलन, रूस से बड़े आयात और कई रणनीतिक क्षेत्रों में बाहरी निर्भरता बताते हैं कि भारत को केवल व्यापार बढ़ाने की नहीं, बल्कि व्यापार की गुणवत्ता बदलने की जरूरत है। ब्रिक्स भारत के लिए नए बाजार, वैकल्पिक भुगतान व्यवस्था, तकनीकी सहयोग, निवेश और ग्लोबल साउथ में आर्थिक विस्तार के अवसर खोल सकता है। लेकिन इन अवसरों को परिणामों में बदलने के लिए विनिर्माण, अनुसंधान, कौशल, लॉजिस्टिक्स, गुणवत्ता, निर्यात वित्त और घरेलू मूल्यवर्धन को मजबूत करना होगा। भारत के लिए ब्रिक्स की सबसे बड़ी सफलता तब होगी, जब कूटनीतिक पूंजी कारखानों, प्रयोगशालाओं, स्टार्टअप, निर्यात और रोजगार में बदल सके।
नई दिल्ली में हुआ ब्रिक्स सम्मेलन यह संकेत देता है कि भारत बदलती विश्व व्यवस्था का केवल दर्शक नहीं रहना चाहता, बल्कि उसे आकार देने में सक्रिय भूमिका निभाना चाहता है। आतंकवाद के खिलाफ स्पष्ट रुख, ग्लोबल साउथ की आवाज, बहुपक्षीय संस्थाओं में सुधार, स्थानीय मुद्राओं में व्यापार, डिजिटल सार्वजनिक अवसंरचना, एआई, स्वास्थ्य, इंडस्ट्री 4.0 और रणनीतिक स्वायत्तता—ये सभी भारत की व्यापक कूटनीतिक सोच की ओर संकेत करते हैं।
लेकिन भारत को केवल घोषणाओं से आगे बढ़कर परिणामों पर ध्यान देना होगा। कूटनीतिक प्रभाव आर्थिक अवसर में, आर्थिक अवसर तकनीकी क्षमता में और तकनीकी क्षमता भारतीय निर्यात तथा रोजगार में बदलनी चाहिए। यही प्रक्रिया भारत की रणनीतिक स्वायत्तता को वास्तविक मजबूती देगी।
ब्रिक्स न तो डॉलर व्यवस्था के अंत की घोषणा है, न पश्चिमी व्यवस्था के अंत की और न ही कोई नया सैन्य गठबंधन। यह बदलती दुनिया में सहयोग, विकल्प और संतुलन की संभावनाओं को तलाशने वाला मंच है। भारत के लिए इसका संदेश स्पष्ट है—सभी के साथ सहयोग करें, जहां आवश्यक हो वहां प्रतिस्पर्धा करें, संवाद के लिए खुले रहें, राष्ट्रीय सुरक्षा पर दृढ़ रहें और हर बड़े निर्णय में भारत के राष्ट्रीय हित को सर्वोच्च रखें।
