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बी.एससी. समस्या नहीं, असली समस्या रोजगार सृजन की है

धीरे-धीरे हमारे समाज में यह धारणा मजबूत होती जा रही है कि कुछ विशेष डिग्रियां ही भविष्य की गारंटी हैं ।

Few hours ago
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बी.एससी. समस्या नहीं, असली समस्या रोजगार सृजन की है

डॉ. प्रीति वर्मा

सहायक प्राध्यापक, वनस्पति विज्ञान

 

आज जब विद्यार्थी अपने भविष्य और विषय के चयन को लेकर निर्णय लेने की स्थिति में होते हैं, तो उनके सामने सबसे अधिक पूछा जाने वाला सवाल होता है—“किस डिग्री में सबसे ज्यादा अवसर हैं?” इसी सवाल के जवाब में अक्सर विद्यार्थियों और अभिभावकों को सलाह दी जाती है—“बी.एससी. में अब क्या रखा है?”, “बी.ए. या बी.कॉम. करने से क्या मिलेगा?”, “इससे अच्छा आंकड़ा विज्ञान, कृत्रिम बुद्धिमत्ता या कोई अधिक मांग वाला पाठ्यक्रम कर लो।”

 

धीरे-धीरे हमारे समाज में यह धारणा मजबूत होती जा रही है कि कुछ विशेष डिग्रियां ही भविष्य की गारंटी हैं, जबकि पारंपरिक विषयों का कोई खास महत्व नहीं रह गया है। लेकिन क्या वास्तव में समस्या किसी डिग्री की है?

 

नेपाल के हिमालयी क्षेत्र में हुई हालिया आकस्मिक बाढ़ जैसी प्राकृतिक आपदाएं हमें इस सवाल को एक अलग दृष्टि से देखने के लिए मजबूर करती हैं। ऐसी घटनाएं केवल तत्काल राहत, बचाव और पुनर्वास की चुनौती नहीं होतीं, बल्कि वे हमें यह सोचने पर भी विवश करती हैं कि क्या हमारे पास प्रकृति को समझने, संभावित जोखिमों का वैज्ञानिक आकलन करने, समय रहते चेतावनी देने और आपदाओं के प्रभाव को कम करने के लिए पर्याप्त ज्ञान और संस्थागत क्षमता है।

 

जलवायु परिवर्तन अब केवल किताबों में पढ़ाया जाने वाला पर्यावरणीय विषय नहीं रह गया है। इसका सीधा संबंध जल सुरक्षा, कृषि, जैव विविधता, स्वास्थ्य, खाद्य सुरक्षा, आधारभूत संरचना और मानव जीवन से है। तापमान में बदलाव, वर्षा के स्वरूप में परिवर्तन, हिमालयी पारिस्थितिकी तंत्र की संवेदनशीलता, हिमनदों और जलस्रोतों में बदलाव तथा अचानक आने वाली बाढ़ जैसी घटनाएं आने वाले वर्षों में बड़ी चुनौतियां बन सकती हैं।

 

इन चुनौतियों को समझने और उनका समाधान खोजने के लिए हमें प्रकृति को समझने वाले वैज्ञानिकों की आवश्यकता होगी। हमें वनस्पतिशास्त्रियों की जरूरत है, जो पौधों, वनस्पतियों, पारिस्थितिकी तंत्र और जैव विविधता को समझते हैं। हमें प्राणीशास्त्रियों और पारिस्थितिकीविदों की जरूरत है, जो जीव-जंतुओं और उनके पर्यावरणीय संबंधों का अध्ययन करते हैं। हमें भूवैज्ञानिकों की आवश्यकता है, जो पृथ्वी की संरचना और भूगर्भीय प्रक्रियाओं को समझ सकें। हमें पर्यावरण वैज्ञानिक चाहिए, जो प्रदूषण, पारिस्थितिक बदलाव और पर्यावरणीय जोखिमों का अध्ययन कर सकें। मौसम वैज्ञानिकों और जल वैज्ञानिकों की आवश्यकता होगी, जो मौसम, जलवायु, नदियों, भूजल और जल संसाधनों में होने वाले बदलावों को समझ सकें।

 

इसके साथ ही हमें आंकड़ा वैज्ञानिकों, कृत्रिम बुद्धिमत्ता विशेषज्ञों, अभियंताओं और तकनीकी विशेषज्ञों की भी जरूरत होगी। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि इन सभी क्षेत्रों को अलग-अलग नहीं, बल्कि एक-दूसरे के साथ मिलकर काम करना होगा।

 

आज आंकड़ा विज्ञान और कृत्रिम बुद्धिमत्ता को भविष्य का सबसे बड़ा क्षेत्र बताकर विद्यार्थियों को पारंपरिक विषयों से दूर करने की प्रवृत्ति बढ़ रही है। निश्चित रूप से आंकड़ा विज्ञान और कृत्रिम बुद्धिमत्ता का महत्व तेजी से बढ़ रहा है। लेकिन हमें यह समझना होगा कि आंकड़े अपने आप कोई वैज्ञानिक अर्थ नहीं बताते।

 

कृत्रिम बुद्धिमत्ता हजारों पर्यावरणीय आंकड़ों, उपग्रह चित्रों, तापमान, वर्षा, नदी के जलस्तर और मिट्टी की नमी से जुड़े आंकड़ों का विश्लेषण कर सकती है। वह उनमें छिपे पैटर्न को पहचान सकती है और संभावित जोखिमों का अनुमान लगाने में मदद कर सकती है। लेकिन यह समझने के लिए कि इन आंकड़ों का वैज्ञानिक अर्थ क्या है, मूलभूत विज्ञान का ज्ञान आवश्यक है।

 

सही वैज्ञानिक प्रश्न कौन पूछेगा? कौन तय करेगा कि कौन-से आंकड़े महत्वपूर्ण हैं? कौन यह समझेगा कि किसी मॉडल का परिणाम वास्तविक दुनिया में वैज्ञानिक रूप से सही है या नहीं? यहीं पर बुनियादी विज्ञान और मूलभूत शिक्षा की भूमिका सामने आती है।

 

आंकड़ा विज्ञान विज्ञान का विकल्प नहीं है। बल्कि कई बार आंकड़ा विज्ञान की प्रभावशीलता मजबूत वैज्ञानिक ज्ञान पर निर्भर करती है। कृत्रिम बुद्धिमत्ता को सही सवाल पूछने के लिए विषय-विशेषज्ञों की आवश्यकता होती है। सही आंकड़ों का चयन करने के लिए वैज्ञानिक समझ जरूरी है। किसी मॉडल के परिणाम की वास्तविक दुनिया के संदर्भ में व्याख्या करने के लिए विषय-ज्ञान आवश्यक है।

 

इसलिए भविष्य में हमें “विज्ञान या कृत्रिम बुद्धिमत्ता” की सोच के बजाय “विज्ञान के साथ कृत्रिम बुद्धिमत्ता” की सोच विकसित करनी होगी।

 

यह बात विद्यार्थियों और अभिभावकों तक स्पष्ट रूप से पहुंचनी चाहिए कि समस्या बी.एससी. की नहीं, बल्कि रोजगार सृजन की है। यदि किसी विषय में हजारों विद्यार्थी पढ़ रहे हैं, लेकिन उनके लिए पर्याप्त शोध संस्थान, प्रयोगशालाएं, पर्यावरणीय निगरानी केंद्र, विश्वविद्यालयों में शोध के अवसर, उद्योगों में रोजगार और सरकारी संस्थानों में पद उपलब्ध नहीं हैं, तो इसका अर्थ यह नहीं है कि वह विषय बेकार है। इसका अर्थ यह है कि उस क्षेत्र में पर्याप्त अवसर और रोजगार पैदा नहीं किए गए हैं।

 

इसलिए सवाल यह नहीं होना चाहिए कि “बी.एससी. करने के बाद क्या मिलेगा?” बल्कि सवाल यह होना चाहिए कि “हमने बी.एससी. और अन्य विषयों के विद्यार्थियों के लिए पर्याप्त अवसर क्यों नहीं बनाए?”

 

यदि किसी देश को वैज्ञानिक और तकनीकी रूप से मजबूत बनना है, तो उसे अनुसंधान और विकास में निवेश बढ़ाना होगा। प्रयोगशालाओं को मजबूत करना होगा। विश्वविद्यालयों में शोध के अवसर बढ़ाने होंगे। पर्यावरणीय निगरानी और जलवायु अध्ययन के लिए संस्थागत ढांचा विकसित करना होगा। आपदा प्रबंधन के लिए प्रशिक्षित मानव संसाधन तैयार करना होगा। उद्योग और शैक्षणिक संस्थानों के बीच सहयोग बढ़ाना होगा। तभी शिक्षा वास्तविक रोजगार और सामाजिक उपयोगिता में बदल सकेगी।

 

कल्पना कीजिए कि किसी देश में हर विद्यार्थी आंकड़ा वैज्ञानिक बनने की कोशिश करने लगे। तब पौधों की जैव विविधता का अध्ययन कौन करेगा? वनस्पतियों में हो रहे बदलावों की निगरानी कौन करेगा? मिट्टी और पारिस्थितिकी तंत्र को कौन समझेगा? जीव-जंतुओं की संख्या और उनके आवास में होने वाले परिवर्तन का अध्ययन कौन करेगा? क्षेत्रीय और मैदानी अनुसंधान कौन करेगा? पर्यावरण में हो रहे बदलावों का अध्ययन कौन करेगा? बुनियादी विज्ञान कौन पढ़ाएगा? और वह मूल वैज्ञानिक ज्ञान कौन तैयार करेगा, जिसके आधार पर आंकड़ों का सही अर्थ निकाला जा सके?

 

किसी भी देश का विकास केवल एक विषय या एक प्रकार के पेशे पर निर्भर नहीं हो सकता। विकास स्वयं एक बहुविषयक प्रक्रिया है। तकनीक को विज्ञान की आवश्यकता है। कृत्रिम बुद्धिमत्ता को आंकड़ों की आवश्यकता है। आंकड़ों को वैज्ञानिक अवलोकन की आवश्यकता है। वैज्ञानिक अवलोकन के लिए विषय-विशेषज्ञता आवश्यक है और वैज्ञानिक समझ के लिए मजबूत शिक्षा जरूरी है।

 

इसलिए शिक्षा व्यवस्था को एक विषय को दूसरे विषय का विकल्प बनाने के बजाय उनके बीच संबंध विकसित करने पर जोर देना चाहिए।

 

जलवायु परिवर्तन के दौर में बुनियादी विज्ञान का महत्व और बढ़ गया है। हिमालयी क्षेत्र में बदलते तापमान, वर्षा के स्वरूप, हिमनदों की स्थिति, नदियों के प्रवाह और पारिस्थितिक बदलावों को समझने के लिए विभिन्न वैज्ञानिक विषयों की आवश्यकता होगी। प्राकृतिक आपदाओं के जोखिम को कोई एक विशेषज्ञ अकेले नहीं समझ सकता।

 

नेपाल में आई हालिया आकस्मिक बाढ़ जैसी त्रासदियां हमें यह याद दिलाती हैं कि केवल आपदा आने के बाद राहत पहुंचाना पर्याप्त नहीं है। हमें आपदा से पहले जोखिम की पहचान, वैज्ञानिक निगरानी, पूर्व चेतावनी प्रणाली, स्थानीय स्तर पर तैयारी और मजबूत आधारभूत ढांचे की आवश्यकता है। इन सभी क्षेत्रों में वैज्ञानिकों, तकनीकी विशेषज्ञों, प्रशासन, स्थानीय समुदायों और नीति-निर्माताओं के बीच समन्वय आवश्यक है।

 

जब कोई विद्यार्थी जीवविज्ञान, वनस्पति विज्ञान, भूगोल, पर्यावरण विज्ञान, भूविज्ञान, रसायन विज्ञान या भौतिक विज्ञान पढ़ता है, तो वह केवल परीक्षा की तैयारी नहीं कर रहा होता। वह प्रकृति और भौतिक दुनिया को समझने की बुनियाद तैयार कर रहा होता है।

 

जीवविज्ञान का विद्यार्थी आंकड़ों का विश्लेषण सीख सकता है। वनस्पति विज्ञान का विद्यार्थी कृत्रिम बुद्धिमत्ता की सहायता से अनुसंधान कर सकता है। पर्यावरण वैज्ञानिक दूरसंवेदी तकनीक और भौगोलिक आंकड़ों का उपयोग कर सकता है। भूविज्ञानी आपदा जोखिम के आकलन में योगदान दे सकता है। भौतिक विज्ञान का विद्यार्थी जलवायु अध्ययन और ऊर्जा क्षेत्र में योगदान दे सकता है। रसायन विज्ञान का विद्यार्थी प्रदूषण, जल गुणवत्ता और नई सामग्रियों के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है।

 

यही भविष्य है—एक विषय को दूसरे का विकल्प बनाने का नहीं, बल्कि विभिन्न विषयों को एक साथ जोड़ने का।

 

इसलिए विद्यार्थियों से यह कहना उचित नहीं है कि “बी.एससी. में कोई अवसर नहीं है, आंकड़ा विज्ञान कर लो।” इसके बजाय उन्हें कहना चाहिए—“अपना बुनियादी ज्ञान मजबूत करो, व्यावहारिक कौशल विकसित करो, नई तकनीक सीखो और अपने ज्ञान का उपयोग समाज की वास्तविक समस्याओं को हल करने में करो।”

 

आज रोजगार का स्वरूप निश्चित रूप से बदल रहा है। नई तकनीकें नए रोजगार पैदा कर रही हैं और कई पारंपरिक भूमिकाओं का स्वरूप भी बदल रहा है। लेकिन इसका अर्थ यह नहीं है कि बुनियादी विज्ञान अप्रासंगिक हो गया है। वास्तव में जैसे-जैसे तकनीक जटिल होती जाएगी, उसे सही दिशा देने के लिए मजबूत विषय-ज्ञान की आवश्यकता भी बढ़ेगी।

 

हमें अपने बच्चों से यह पूछना बंद करना होगा कि “किस डिग्री में सबसे ज्यादा अवसर हैं?” और इसके बजाय पूछना होगा—“समाज को किस ज्ञान की आवश्यकता है और तुम्हारी शिक्षा उस समस्या को हल करने में कैसे योगदान दे सकती है?”

 

किसी भी डिग्री का मूल्य केवल उसके नाम से तय नहीं होता। उसका मूल्य इस बात से तय होता है कि उससे प्राप्त ज्ञान का उपयोग किस तरह किया जा सकता है और समाज उस ज्ञान के लिए कितने अवसर तैयार करता है।

 

यदि बी.एससी. के बाद पर्याप्त रोजगार नहीं हैं, तो समाधान विद्यार्थियों को विज्ञान से दूर करना नहीं, बल्कि विज्ञान आधारित रोजगार का विस्तार करना है। यदि शोध के अवसर कम हैं, तो शोध में निवेश बढ़ाना होगा। यदि प्रयोगशालाएं पर्याप्त नहीं हैं, तो उन्हें आधुनिक बनाना होगा। यदि उद्योगों में वैज्ञानिकों की मांग कम है, तो उद्योग और शैक्षणिक संस्थानों के बीच सहयोग को मजबूत करना होगा।

 

एक मजबूत राष्ट्र वह नहीं है, जहां हर युवा एक ही लोकप्रिय डिग्री हासिल करे। मजबूत राष्ट्र वह है, जहां अलग-अलग क्षेत्रों का ज्ञान मिलकर राष्ट्रीय समस्याओं के समाधान में योगदान दे।

 

नेपाल की फ्लैश फ्लड जैसी प्राकृतिक आपदाएं हमें केवल प्रकृति की शक्ति का अहसास नहीं करातीं, बल्कि यह भी याद दिलाती हैं कि भविष्य की चुनौतियों के लिए हमें बहुविषयक ज्ञान की आवश्यकता होगी। जलवायु परिवर्तन, जल संकट, प्रदूषण, जैव विविधता का नुकसान और प्राकृतिक आपदाएं ऐसी समस्याएं हैं, जिनका समाधान केवल कृत्रिम बुद्धिमत्ता, केवल आंकड़ा विज्ञान या केवल अभियंत्रण से नहीं हो सकता।

 

हमें वैज्ञानिक चाहिए। हमें तकनीकी विशेषज्ञ चाहिए। हमें आंकड़ा वैज्ञानिक चाहिए। हमें पर्यावरणविद चाहिए। हमें शिक्षक चाहिए। हमें शोधकर्ता चाहिए। और सबसे बढ़कर हमें ऐसे युवा चाहिए, जो अलग-अलग विषयों के ज्ञान को जोड़कर समस्याओं का समाधान कर सकें।

 

इसलिए बी.एससी. समस्या नहीं है। समस्या तब पैदा होती है, जब हम शिक्षा को रोजगार से जोड़ने के लिए पर्याप्त संस्थान, शोध, उद्योग और अवसर नहीं बनाते।

 

भविष्य किसी एक डिग्री का नहीं है। भविष्य उस ज्ञान का है, जो बदलती दुनिया को समझ सके, तकनीक का जिम्मेदारी से उपयोग कर सके और वास्तविक समस्याओं के समाधान में योगदान दे सके।

 

हमें अपने बच्चों को केवल “अधिक मांग वाले पाठ्यक्रम” चुनने की सलाह नहीं देनी चाहिए। हमें उन्हें ऐसा ज्ञान चुनने के लिए प्रेरित करना चाहिए, जिसमें उनकी रुचि हो, जिसकी समाज को आवश्यकता हो और जिसे वे आधुनिक तकनीक तथा व्यावहारिक कौशल के साथ जोड़ सकें।

 

क्योंकि रोजगार का भविष्य केवल डिग्री बदलने से नहीं बदलेगा। रोजगार का भविष्य तब बदलेगा, जब हम ज्ञान, कौशल, अनुसंधान, उद्योग और अवसरों के बीच मजबूत संबंध बनाएंगे।

 

और शायद यही वह सवाल है, जो हमें आज अपने बच्चों से नहीं, बल्कि अपनी शिक्षा व्यवस्था और नीति-निर्माताओं से पूछना चाहिए—

 

“हम किस डिग्री को कमतर बता रहे हैं, और उसके बजाय किस तरह के रोजगार और भविष्य का निर्माण कर रहे हैं?”