आसमान की कमान से अयोध्या की जिम्मेदारी तक: वर्दी, वीरता और राष्ट्रसेवा की एक प्रेरक गाथा
एयर मार्शल (सेवानिवृत्त) जितेंद्र मिश्रा की जीवन-यात्रा इसी भावना की कहानी है।

बड़ा बनने के लिए बड़ी जगह से शुरुआत जरूरी नहीं। जरूरी है बड़ा सपना, कठोर अनुशासन और देश के लिए कुछ करने की जिद। देश के लिए इससे बड़ा प्रेरक संदेश और क्या हो सकता है कि जिस व्यक्ति ने जीवन का पहला अध्याय भारत के आसमान की सुरक्षा में लिखा, वह अब जीवन का अगला अध्याय अयोध्या में श्रीराम की नगरी की सेवा में लिखने जा रहा है।
यह केवल एक अधिकारी की नई नियुक्ति नहीं है। यह उस विचार की जीत है कि राष्ट्रसेवा का कोई रिटायरमेंट नहीं होता।
कुछ यात्राएं केवल व्यक्ति की नहीं होतीं। वे एक विचार की यात्रा होती हैं, एक संकल्प की यात्रा। ऐसी यात्रा, जिसमें पद आते-जाते रहते हैं, वर्दी बदल जाती है, जिम्मेदारियां बदल जाती हैं, लेकिन एक चीज कभी नहीं बदलती—राष्ट्र के प्रति समर्पण।
एयर मार्शल (सेवानिवृत्त) जितेंद्र मिश्रा की जीवन-यात्रा इसी भावना की कहानी है। भारतीय वायुसेना में लगभग चार दशक की सेवा, फाइटर पायलट से लेकर उच्चतम कमान तक का सफर, चुनौतीपूर्ण सैन्य परिस्थितियों में नेतृत्व, ऑपरेशन सिंदूर के दौरान पश्चिमी वायु कमान की कमान और उसके बाद सेवानिवृत्ति के कुछ ही महीनों में अयोध्या स्थित श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट के मुख्य कार्यकारी अधिकारी (सीईओ) के रूप में नई जिम्मेदारी—यह यात्रा अपने आप में असाधारण है।
2 सितंबर 2026 को श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट ने उन्हें अपना पहला पूर्णकालिक सीईओ नियुक्त किया। यह निर्णय ऐसे समय में आया है, जब ट्रस्ट अपने प्रशासनिक और वित्तीय ढांचे को और अधिक व्यवस्थित, पारदर्शी और पेशेवर बनाने की दिशा में आगे बढ़ रहा है। यह संयोग मात्र नहीं लगता कि जिस व्यक्ति ने जीवन के लगभग चार दशक भारत की सीमाओं और आकाश की सुरक्षा में लगाए, अब वही व्यक्ति अयोध्या में करोड़ों श्रद्धालुओं की आस्था के केंद्र श्रीराम मंदिर की प्रशासनिक व्यवस्था की जिम्मेदारी संभालेगा।
एक ओर भारत की भौगोलिक सीमाओं की सुरक्षा थी, दूसरी ओर भारत की सांस्कृतिक चेतना का एक बड़ा प्रतीक। यही कारण है कि जितेंद्र मिश्रा की कहानी केवल एक पूर्व सैन्य अधिकारी की कहानी नहीं है। यह उस भारत की कहानी है, जहां राष्ट्रसेवा के रास्ते अलग हो सकते हैं, लेकिन राष्ट्र के प्रति भावना एक ही रहती है।
जितेंद्र मिश्रा उत्तर प्रदेश के देवरिया जिले से आते हैं। उनका प्रारंभिक जीवन किसी राजसी या विशेषाधिकार प्राप्त वातावरण में नहीं बीता। उपलब्ध विवरणों के अनुसार उनका परिवार सामान्य मध्यमवर्गीय पृष्ठभूमि से जुड़ा था और उनके पिता शिक्षक थे। यही पृष्ठभूमि उनकी कहानी को और प्रेरणादायक बनाती है।
किसी छोटे शहर या सामान्य परिवार से निकलकर देश की प्रतिष्ठित सैन्य संस्थाओं में स्थान बनाना अपने आप में उपलब्धि है। लेकिन मिश्रा की कहानी यहीं समाप्त नहीं होती।
उन्होंने नेशनल डिफेंस एकेडमी, पुणे से सैन्य प्रशिक्षण प्राप्त किया। इसके बाद भारतीय वायुसेना की फाइटर स्ट्रीम में उनका कमीशन हुआ। 6 दिसंबर 1986 को वे भारतीय वायुसेना में फाइटर पायलट के रूप में शामिल हुए।
उस दिन शायद किसी ने नहीं सोचा होगा कि यह युवा अधिकारी आने वाले वर्षों में भारतीय वायुसेना की पश्चिमी कमान का नेतृत्व करेगा और युद्ध सेवा के लिए देश के सर्वोच्च सैन्य सम्मानों में से एक से सम्मानित होगा।
इतिहास उन्हीं लोगों को याद रखता है, जो अवसर मिलने पर नहीं, बल्कि जिम्मेदारी आने पर अपने आपको साबित करते हैं।
लड़ाकू विमान उड़ाना केवल तकनीकी दक्षता का काम नहीं है। आसमान में हजारों फीट की ऊंचाई पर कुछ सेकंड का निर्णय जीवन और मृत्यु के बीच अंतर पैदा कर सकता है। वहां डर के लिए कोई जगह नहीं होती। वहां निर्णय लेना होता है—तेज, सटीक और जिम्मेदारी के साथ।
जितेंद्र मिश्रा ने अपने सैन्य जीवन में 3,000 से अधिक घंटे की उड़ान भरी और 18 से अधिक प्रकार के विमानों पर उड़ान का अनुभव हासिल किया। वे फाइटर कॉम्बैट लीडर और एक्सपेरिमेंटल टेस्ट पायलट भी रहे।
एक्सपेरिमेंटल टेस्ट पायलट होना अपने आप में अत्यंत चुनौतीपूर्ण जिम्मेदारी है। ऐसे पायलटों को केवल विमान उड़ाना नहीं होता, बल्कि विमान और उसकी प्रणालियों को कठिन परिस्थितियों में परखना होता है। इस अनुभव ने उन्हें केवल एक बेहतर पायलट नहीं बनाया, बल्कि ऐसा अधिकारी बनाया, जो तकनीक, रणनीति, जोखिम और निर्णय—चारों को एक साथ समझता था।
उन्होंने फाइटर स्क्वाड्रन के कमांडिंग ऑफिसर के रूप में काम किया और अग्रिम वायुसेना अड्डों की कमान संभाली। एयरक्राफ्ट एंड सिस्टम्स टेस्टिंग एस्टेब्लिशमेंट (ASTE) में चीफ टेस्ट पायलट और बाद में कमांडेंट की जिम्मेदारी भी निभाई।
इसके बाद उनके अनुभव का दायरा और व्यापक हुआ। एयर हेडक्वार्टर में ऑपरेशनल प्लानिंग एंड असेसमेंट सहित महत्वपूर्ण रणनीतिक जिम्मेदारियां, असिस्टेंट चीफ ऑफ एयर स्टाफ (प्रोजेक्ट्स) और इंटीग्रेटेड डिफेंस स्टाफ में वरिष्ठ दायित्वों ने उनके सैन्य नेतृत्व को और मजबूत किया।
सैन्य नेतृत्व केवल युद्ध लड़ने की क्षमता का नाम नहीं है। यह योजना बनाने, संसाधनों का सही उपयोग करने, लोगों को साथ लेकर चलने, जोखिम का आकलन करने और सही समय पर सही निर्णय लेने की कला है। जितेंद्र मिश्रा के लंबे सैन्य जीवन में इन सभी गुणों का विकास हुआ।
1 जनवरी 2025 को जितेंद्र मिश्रा ने भारतीय वायुसेना की अत्यंत महत्वपूर्ण वेस्टर्न एयर कमांड के एयर ऑफिसर कमांडिंग इन चीफ का पद संभाला। पश्चिमी वायु कमान का महत्व केवल संगठनात्मक नहीं है। यह भारत के पश्चिमी क्षेत्र की सुरक्षा से सीधे जुड़ी रणनीतिक कमान है।
ऐसे पद पर बैठे अधिकारी को केवल विमान और हथियारों की जानकारी नहीं होनी चाहिए। उसे बदलती परिस्थितियों, दुश्मन की रणनीति, तकनीकी क्षमताओं, खुफिया सूचनाओं और अपने सैनिकों की क्षमता—सभी का आकलन करना होता है।
फिर आया वह समय, जिसने उनके सैन्य जीवन को इतिहास के एक महत्वपूर्ण अध्याय से जोड़ दिया—ऑपरेशन सिंदूर।
मई 2025 में भारत ने आतंकवाद के विरुद्ध ऑपरेशन सिंदूर के माध्यम से सैन्य कार्रवाई की। उस समय पश्चिमी वायु कमान की कमान एयर मार्शल जितेंद्र मिश्रा के हाथों में थी। सैन्य अभियान में किसी कमांडर की भूमिका केवल सामने दिखाई देने वाली कार्रवाई तक सीमित नहीं होती। उसके पीछे लंबे समय की तैयारी, रणनीतिक योजना, प्रशिक्षण, संसाधनों का प्रबंधन और विभिन्न इकाइयों के बीच तालमेल होता है।
ऑपरेशन सिंदूर ने भारतीय सैन्य क्षमता और आधुनिक युद्ध की बदलती प्रकृति को भी सामने रखा। ऐसे संवेदनशील समय में पश्चिमी वायु कमान का नेतृत्व करना अपने आप में बड़ी जिम्मेदारी थी।
जितेंद्र मिश्रा को उनके योगदान के लिए सर्वोत्तम युद्ध सेवा मेडल से सम्मानित किया गया। इसके अतिरिक्त उन्हें अति विशिष्ट सेवा मेडल (एवीएसएम) और विशिष्ट सेवा मेडल (वीएसएम) भी प्राप्त हुए हैं।
इन सम्मानों को केवल पुरस्कार समझना भूल होगी। एक सैनिक के सीने पर लगा पदक उसके व्यक्तिगत गौरव से कहीं अधिक होता है। वह उसके पीछे खड़े हजारों सैनिकों, परिवारों, प्रशिक्षकों और सहकर्मियों की मेहनत का भी प्रतीक होता है। पदक धातु का होता है, लेकिन उसके पीछे की कहानी खून, पसीने, अनुशासन और त्याग से लिखी जाती है।
30 अप्रैल 2026 को एयर मार्शल जितेंद्र मिश्रा भारतीय वायुसेना से सेवानिवृत्त हुए। सामान्य अर्थों में यह उनके सैन्य जीवन का अंत था। लेकिन क्या राष्ट्रसेवा की कोई सेवानिवृत्ति होती है? शायद नहीं। जितेंद्र मिश्रा की अगली जिम्मेदारी ने इस बात को प्रमाणित कर दिया।
सेवानिवृत्ति के कुछ ही महीनों बाद उन्हें एक ऐसी संस्था की जिम्मेदारी मिली, जिसका संबंध भारत की आस्था, संस्कृति, इतिहास और करोड़ों लोगों की भावनाओं से है।
श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट के पहले पूर्णकालिक सीईओ के रूप में उनकी नियुक्ति देखने में जितनी बड़ी है, भीतर से उतनी ही स्वाभाविक भी लगती है। वायुसेना में उनका काम था—देश की सुरक्षा, संगठन का संचालन, संसाधनों का प्रबंधन और कठिन परिस्थितियों में निर्णय। अब अयोध्या में जिम्मेदारी होगी—प्रशासन, व्यवस्था, संचालन, पारदर्शिता, संसाधन प्रबंधन और करोड़ों श्रद्धालुओं की सुविधा सुनिश्चित करने की।
क्षेत्र अलग है, लेकिन प्रबंधन, अनुशासन और जवाबदेही के सिद्धांत वही हैं।
यही कारण है कि ट्रस्ट ने इतने बड़े पद के लिए सैन्य पृष्ठभूमि वाले व्यक्ति को चुना। रिपोर्टों के अनुसार सीईओ के चयन के लिए 5,585 आवेदन प्राप्त हुए थे। कई चरणों की छंटनी और साक्षात्कार के बाद तीन नामों का पैनल बनाया गया और अंततः जितेंद्र मिश्रा का चयन हुआ।
यह तथ्य बताता है कि उनका चयन केवल औपचारिकता नहीं था। उनकी सैन्य पृष्ठभूमि, नेतृत्व क्षमता और संस्थागत प्रबंधन का अनुभव इस चयन में महत्वपूर्ण माना गया।
अयोध्या में श्रीराम मंदिर का निर्माण भारतीय इतिहास की एक असाधारण घटना है। करोड़ों भारतीयों के लिए यह केवल धार्मिक स्थल नहीं, बल्कि आस्था, संस्कृति और सदियों पुरानी ऐतिहासिक स्मृति से जुड़ा विषय है। इसलिए मंदिर की व्यवस्था भी सामान्य संस्थान जैसी नहीं हो सकती।
यहां प्रतिदिन बड़ी संख्या में श्रद्धालु आते हैं और आने वाले समय में यह संख्या और बढ़ने की संभावना है। ऐसे में मंदिर प्रशासन को विश्वस्तरीय प्रबंधन, डिजिटल व्यवस्था, सुरक्षा, स्वच्छता, भीड़ नियंत्रण, वित्तीय पारदर्शिता, श्रद्धालु सुविधा और दीर्घकालीन योजना—सभी मोर्चों पर काम करना होगा। यहीं एक पूर्व सैन्य कमांडर का अनुभव उपयोगी हो सकता है।
सेना में किसी बड़ी व्यवस्था को सुचारु रूप से चलाने के लिए एसओपी, जवाबदेही, कमांड स्ट्रक्चर और मॉनिटरिंग की आवश्यकता होती है। उसी प्रकार बड़े धार्मिक-सांस्कृतिक संस्थान को भी व्यवस्थित प्रशासन की जरूरत होती है। आस्था अपनी जगह है, लेकिन आस्था की सेवा के लिए व्यवस्था भी उतनी ही जरूरी है।
जितेंद्र मिश्रा की नियुक्ति का महत्व इसलिए भी बढ़ जाता है क्योंकि राम मंदिर ट्रस्ट हाल के महीनों में दान और वित्तीय प्रबंधन से जुड़े विवादों के कारण सार्वजनिक जांच के दायरे में रहा है। ऐसी स्थिति में सीईओ की भूमिका केवल कार्यालय चलाने तक सीमित नहीं होगी। सबसे बड़ी चुनौती होगी—विश्वास को और मजबूत करना।
रामभक्तों द्वारा दिया गया प्रत्येक रुपया केवल धन नहीं है। उसके साथ उनकी आस्था जुड़ी है। किसी गरीब परिवार का छोटा-सा योगदान हो या किसी उद्योगपति का बड़ा दान, दोनों का भावनात्मक मूल्य है। इसलिए मंदिर की आर्थिक व्यवस्था में पारदर्शिता, ऑडिट, डिजिटल ट्रैकिंग, जवाबदेही और स्पष्ट प्रक्रियाएं अत्यंत महत्वपूर्ण होंगी।
यही वह क्षेत्र है, जहां सैन्य अनुशासन की कार्यसंस्कृति महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है। सेना में जिम्मेदारी व्यक्तिगत होती है। आदेश की जवाबदेही तय होती है। प्रक्रिया का पालन होता है। रिकॉर्ड रखा जाता है और गलती की स्थिति में उत्तरदायित्व तय किया जाता है।
यदि यही सोच मंदिर प्रशासन में प्रभावी रूप से लागू होती है, तो इससे श्रद्धालुओं का विश्वास और मजबूत हो सकता है।
आज देश के सामने सबसे बड़ी समस्याओं में से एक केवल संसाधनों की कमी नहीं है। कई बार समस्या व्यवस्था की कमी होती है। हमारे पास प्रतिभा है, पैसा है, तकनीक है और मानव संसाधन है। लेकिन इन सबको सही दिशा में लगाने के लिए अनुशासन और जवाबदेही चाहिए। यही किसी सैन्य अधिकारी की बड़ी ताकत होती है।
जितेंद्र मिश्रा लगभग चार दशक तक ऐसी व्यवस्था का हिस्सा रहे, जहां समय की कीमत होती है, आदेश की स्पष्टता होती है और गलती की कीमत बहुत बड़ी हो सकती है। अब वही अनुभव अयोध्या में एक अलग रूप में सामने आएगा।
भारतीय संस्कृति में श्रीराम केवल पूजा के पात्र नहीं हैं। वे मर्यादा, कर्तव्य, नेतृत्व, त्याग और न्याय के प्रतीक हैं। रामराज्य की कल्पना में सबसे महत्वपूर्ण बात केवल समृद्धि नहीं थी, बल्कि न्यायपूर्ण और उत्तरदायी शासन भी था।
यही कारण है कि अयोध्या में श्रीराम मंदिर का प्रशासन भी सेवा और सुशासन का उदाहरण बनना चाहिए।
यदि मंदिर आने वाला श्रद्धालु यह महसूस करे कि उसके साथ सम्मानपूर्वक व्यवहार हुआ, व्यवस्था पारदर्शी है, दान का सदुपयोग हो रहा है, स्वच्छता उत्कृष्ट है, सुरक्षा मजबूत है, दर्शन व्यवस्था सुचारु है और प्रशासन जवाबदेह है, तो यही श्रीराम की मर्यादा के अनुरूप सबसे बड़ी सेवा होगी।
जितेंद्र मिश्रा की कहानी का सबसे प्रेरक पक्ष यह है कि यह केवल उनकी व्यक्तिगत उपलब्धि नहीं है। यह भारत के युवाओं को एक संदेश देती है—सफलता का कोई शॉर्टकट नहीं होता।
एक फाइटर पायलट बनने के लिए प्रशिक्षण चाहिए। कमांडर बनने के लिए अनुभव चाहिए। युद्ध के समय नेतृत्व करने के लिए साहस चाहिए। और सेवानिवृत्ति के बाद भी नई जिम्मेदारी स्वीकार करने के लिए सेवा की भावना चाहिए।
लेकिन किसी भी सैनिक के लिए सबसे बड़ा सम्मान उसका पदक नहीं, बल्कि यह विश्वास होता है कि देश ने उसे जिम्मेदारी के योग्य समझा है।
जितेंद्र मिश्रा को बार-बार बड़ी जिम्मेदारियां मिलना इस बात का संकेत है कि उन्होंने अपने लंबे करियर में नेतृत्व और सेवा का विश्वास अर्जित किया। अब वही विश्वास अयोध्या में उनके सामने सबसे बड़ी पूंजी होगा।
जितेंद्र मिश्रा की नियुक्ति को केवल इस दृष्टि से देखना कि एक पूर्व एयर मार्शल को राम मंदिर का सीईओ बनाया गया है, विषय को छोटा कर देना होगा। असल सवाल यह है कि क्या हम भारत के बड़े धार्मिक और सांस्कृतिक संस्थानों को आधुनिक, पारदर्शी और जवाबदेह तरीके से चला सकते हैं?
क्या आस्था और आधुनिक प्रबंधन साथ-साथ चल सकते हैं? क्या धार्मिक संस्थानों में भी सर्वोत्तम प्रशासनिक मानकों को लागू किया जा सकता है? क्या श्रद्धालुओं के विश्वास को संस्थागत पारदर्शिता में बदला जा सकता है?
इन सवालों का उत्तर आने वाले समय में अयोध्या दे सकती है और इस प्रयोग के केंद्र में होंगे एयर मार्शल (सेवानिवृत्त) जितेंद्र मिश्रा।
भारतीय समाज में अक्सर सेवानिवृत्ति को जीवन के एक अध्याय का अंत माना जाता है। लेकिन सैनिक के लिए शायद ऐसा नहीं होता। उसकी वर्दी उतर सकती है, पद समाप्त हो सकता है, कार्यालय बदल सकता है, लेकिन उसके भीतर बैठा राष्ट्रसेवक कभी रिटायर नहीं होता।
एयर मार्शल जितेंद्र मिश्रा इसका जीवंत उदाहरण हैं। उन्होंने लगभग चार दशक तक भारतीय वायुसेना को अपना जीवन दिया। ऑपरेशन सिंदूर के दौरान देश की पश्चिमी वायु सुरक्षा की महत्वपूर्ण कमान संभाली और सैन्य सेवा के लिए सम्मान अर्जित किया। अब अयोध्या में उनके सामने एक अलग तरह की सेवा है।
देश, पद से बड़ा है। कर्तव्य, सम्मान से बड़ा है और राष्ट्रसेवा, व्यक्तिगत उपलब्धि से बड़ी।
एयर मार्शल जितेंद्र मिश्रा की जीवनगाथा इसी संदेश को सामने रखती है। भारत के युवाओं के लिए इससे बड़ा प्रेरक संदेश शायद यही है कि जिम्मेदारी बदल सकती है, लेकिन राष्ट्रसेवा का संकल्प कभी समाप्त नहीं होता।
(लेखक स्वतंत्र पत्रकार हैं)
