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भोपाल में वायु गुणवत्ता सुधारने में नाकामी: 6 साल में 195 करोड़ खर्च, अब बनेगी विशेषज्ञ समिति

भोपाल में वायु प्रदूषण को कम करने के लिए पिछले छह वर्षों में 195 करोड़ रुपये खर्च किए गए, लेकिन शहर की हवा में कोई...

Nov 28
3 min read
भोपाल में वायु गुणवत्ता सुधारने में नाकामी: 6 साल में 195 करोड़ खर्च, अब बनेगी विशेषज्ञ समिति

भोपाल में वायु प्रदूषण को कम करने के लिए पिछले छह वर्षों में 195 करोड़ रुपये खर्च किए गए, लेकिन शहर की हवा में कोई ठोस सुधार दिखाई नहीं दिया। हालात बिगड़ते देख राज्य सरकार अब नगर निगम की कार्ययोजना, उपयोग किए गए बजट और ज़मीनी कामकाज की जांच के लिए एक विशेषज्ञ समिति बनाने जा रही है। यह कदम इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि राष्ट्रीय स्वच्छ वायु कार्यक्रम (NCAP) के तहत मिलने वाले धन के बावजूद शहर का पीएम-10 स्तर लगभग स्थिर बना हुआ है।


NCAP की पृष्ठभूमि और महत्व

भारत सरकार ने 2019 में NCAP शुरू किया था। इसका उद्देश्य देश के 122 प्रदूषण प्रभावित शहरों में 2026 तक पीएम-10 और पीएम-2.5 स्तर में 20-30% तक कमी लाना है।
भोपाल भी इन लक्ष्य शहरों में शामिल है और हर वर्ष केंद्र से करोड़ों की राशि मिलती है। इस फंडिंग का उपयोग सड़क धूल नियंत्रण, गड्ढा भरने, मैकेनक्ल स्वीपिंग, एयर-प्यूरिफाइंग फाउंटेन लगाने और पानी का छिड़काव जैसी गतिविधियों के लिए किया जाता है।

लेकिन, आधिकारिक रिकॉर्ड के अनुसार, इस वर्ष मिले फंड का उपयोग अब तक शून्य है, जबकि शहर लगातार खराब AQI से जूझ रहा है।


BMC को 30 करोड़ मिले, लेकिन योजना तक तैयार नहीं

हाल ही में वल्लभ भवन में हुई समीक्षा बैठक में खुलासा हुआ कि केंद्र से मिले 30 करोड़ रुपये के उपयोग की योजना भोपाल नगर निगम ने अभी तक तैयार नहीं की है।
अधिकारियों ने इस पर असहमति जताते हुए कहा कि बिना ठोस प्लानिंग के फंड का प्रभावी उपयोग संभव नहीं है। इसलिए एक एक्सपर्ट कमेटी बनाने की सिफारिश की गई है, जो निगम के निर्णयों और प्रगति पर निरंतर निगरानी रखेगी।

एक वरिष्ठ अधिकारी के अनुसार, “इतनी बड़ी राशि और बार-बार निर्देशों के बावजूद शहर का AQI जस का तस है। यह गंभीर चिंता का विषय है और जवाबदेही तय करना ज़रूरी है।”


छह साल में 242.56 करोड़ मिले, परिणाम बेहद सीमित

आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार—

  • कुल प्राप्त राशि: ₹242.56 करोड़

  • अब तक खर्च: ₹195.01 करोड़

  • पीएम-10 स्तर:

    • 2017–18 में 112,

    • 2025 में भी लगभग 110

यानी करोड़ों के निवेश के बाद भी प्रदूषण स्तर में कोई सार्थक गिरावट दर्ज नहीं हुई

भले ही “स्वच्छ हवा” रैंकिंग में भोपाल को 200 में से 191 अंक मिले और वह छठे स्थान पर रहा, लेकिन शहर को किसी भी श्रेणी में वास्तविक सुधार के लिए पुरस्कार नहीं मिला। इसके उलट, इंदौर ने पूरे 200 अंक हासिल किए, जबकि जबलपुर दूसरे स्थान पर रहा।


BMC की प्रतिक्रिया

भोपाल नगर निगम के अधीक्षण यंत्री उदित गर्ग ने कहा कि आवश्यक काम जल्द शुरू किए जाएंगे और कमेटी के गठन से प्रक्रियाओं में पारदर्शिता बढ़ेगी। उनके अनुसार, “हमारी प्राथमिकता शहर को धूल-मुक्त बनाना है। सड़क मरम्मत, एयर फाउंटेन और मैकेनिकल क्लीनिंग पर जल्द कार्रवाई होगी।”


विशेषज्ञों की राय

पर्यावरण विशेषज्ञों का कहना है कि प्रदूषण नियंत्रण सिर्फ उपकरण खरीदने या पानी छिड़काव तक सीमित नहीं होना चाहिए।

  • दीर्घकालिक रणनीति,

  • घने यातायात प्रबंधन,

  • निर्माण स्थलों की मॉनिटरिंग, और

  • कचरा प्रबंधन में सुधार
    जैसे कदमों के बिना वायु गुणवत्ता में स्थायी सुधार संभव नहीं है।

उनके अनुसार, “भोपाल जैसे शहरों में प्रदूषण ज्यादा सड़क धूल, निर्माण गतिविधियों और वाहनों से आता है। जब तक इन स्रोतों पर सख्त नियंत्रण नहीं होगा, करोड़ों रुपये खर्च करने से भी बड़ा बदलाव नहीं आएगा।”


इस खबर का व्यापक महत्व

  • नागरिक स्वास्थ्य: लंबे समय तक प्रदूषित हवा से साँस और हृदय रोगों का जोखिम बढ़ता है।

  • शहरी योजना: यह मामला दिखाता है कि सिर्फ बजट देने से समस्या हल नहीं होती—प्रभावी प्रबंधन और पारदर्शिता अनिवार्य है।

  • नीति प्रभाव: NCAP की कार्यप्रणाली और राज्य–स्थानीय निकायों के समन्वय मॉडल पर सवाल खड़े हो सकते हैं।