एमपी वन भूमि घोटाला: गुना में बड़े पैमाने पर जारी अतिक्रमण रैकेट का भंडाफोड़
मध्य प्रदेश के गुना में पिछले 10 वर्षों में 1 लाख हेक्टेयर से अधिक वन भूमि की अवैध बिक्री और कब्जे के एक बड़े रैकेट...
मुख्य बिंदु:
- क्या हुआ: मध्य प्रदेश के गुना जिले में सक्रिय एक संगठित रैकेट ने पिछले 10 वर्षों में 1 लाख हेक्टेयर से अधिक वन भूमि को अवैध रूप से साफ कर बेच दिया है।
- यह क्यों महत्वपूर्ण है: इस सरकारी जमीन को ₹1,000 के स्टांप पेपर पर फर्जी समझौतों के जरिए बेचा जाता है, जिससे बड़े पैमाने पर वनों की कटाई हो रही है और समुदायों के बीच घातक हिंसक झड़पें हो रही हैं।
- क्या बदलाव आ रहे हैं: वन विभाग इस घोटाले के मुख्य आरोपियों के खिलाफ एफआईआर (FIR) दर्ज करने की तैयारी कर रहा है और कब्जाई गई जमीन को वापस लेने के लिए भारी सुरक्षा बल तैनात किया गया है।
- कौन प्रभावित है: इससे स्थानीय आदिवासी समुदाय, फर्जी दस्तावेजों के जाल में फंसकर ठगे गए खरीदार और क्षेत्र में लगातार हो रही हिंसा से जूझ रहा प्रशासन प्रभावित हैं।
अवैध भूमि सांठगांठ का तौर-तरीका (Modus Operandi)
गुना के बामोरी क्षेत्र में एक बेहद संगठित नेटवर्क खुलेआम फल-फूल रहा है। यह रैकेट सरकारी वन भूमि को अवैध रूप से कब्जा कर उसे खेती योग्य कीमती भूखंडों में बदलने और बेचने का एक व्यवस्थित धंधा चला रहा है।
स्थानीय सूत्रों के अनुसार, यह पूरा गैरकानूनी खेल चार चरणों में अंजाम दिया जाता है:
- आदिवासियों का शोषण: बामोरी क्षेत्र के रसूखदार लोग वहां रहने वाले लगभग 75,000 आदिवासियों को पैसे और राशन का लालच देकर जंगलों को काटने के लिए उकसाते हैं।
- जमीन तैयार करना: साफ की गई वन भूमि को ट्रैक्टर से खेती के लायक बनाने के लिए लाखों रुपये खर्च किए जाते हैं। उदाहरण के लिए, लालाराम बंजारा ने झुमका बीट में 13 बीघा जमीन साफ करने के लिए ₹13 लाख खर्च किए।
- जबरन कब्जा करना: जमीन के खेती योग्य बनते ही, स्थानीय दबंग लोग आदिवासियों को डरा-धमकाकर या मामूली रकम देकर जमीन पर कब्जा जमा लेते हैं।
- फर्जी स्टांप पेपर पर सौदे: इन भूखंडों को अवैध नोटरी समझौतों के जरिए तीसरे पक्ष को बेच दिया जाता है। ग्रामीणों ने खुलासा किया कि यह खेल ₹20,000 से ₹50,000 प्रति बीघा की दर से चल रहा है।
"यह पूरा खेल 20,000 से 50,000 रुपये प्रति बीघा की दर पर चल रहा है। जमीन का ट्रांसफर नोटरी और एग्रीमेंट के आधार पर किया जाता है, जिसकी कोई कानूनी वैधता नहीं है।"
वन भूमि के तीन बड़े अवैध सौदों का खुलासा
इस घोटाले के विशाल पैमाने का अंदाजा हाल ही में बामोरी क्षेत्र में उजागर हुए तीन बड़े भूमि सौदों से लगाया जा सकता है, जहां 85 बीघा वन भूमि को ₹22 लाख से अधिक में बेचा गया:
- मामला 1 (झुमका बीट): जगदीश भीलाला ने 33 बीघा वन भूमि साफ की और 5 फरवरी 2023 को इसे प्रेमनारायण बंजारा को ₹10.85 लाख में बेच दिया।
- मामला 2 (रामपुर बीट): परसादी सहरिया ने 12 बीघा जमीन पर कब्जा किया और 17 जनवरी 2023 को इसे दौलत बंजारा को ₹4 लाख में ट्रांसफर कर दिया।
- मामला 3 (कॉलोनी बीट): जगमोहन किरार ने 40 बीघा सरकारी जमीन पर कब्जा किया और 27 मई 2025 को इसे सुनील मीणा को ₹7.35 लाख में बेच दिया।
जमीन विवादों को लेकर खूनी संघर्ष और मौतें
जमीन के इस अवैध कारोबार ने गुना जिले में बेहद हिंसक झड़पों, आगजनी और जानलेवा हमलों को जन्म दिया है, क्योंकि विभिन्न गुट जमीनों पर कब्जे के लिए आपस में भिड़ रहे हैं।
सितंबर 2025 में फतेहगढ़ के गणेशपुरा में 6 बीघा जमीन को लेकर हुए खूनी संघर्ष में किसान रामस्वरूप नागर की थार गाड़ी से कुचलकर हत्या कर दी गई थी। इस मामले में पुलिस ने 14 लोगों के खिलाफ मामला दर्ज कर 9 आरोपियों को गिरफ्तार किया था, जबकि मुख्य आरोपी पूर्व सरपंच महेंद्र नागर को भाजपा ने पार्टी से निष्कासित कर दिया।
इसी तरह सितंबर 2025 में चकरी-छीकारी गांव में एक और हिंसक झड़प हुई, जहां भील और भीलाला समुदाय के 300 से 400 लोग तीर-कमान लेकर आपस में भिड़ गए। तीर लगने से गंगाराम भील (55) की मौत हो गई, जिसके बाद भारी तनाव को देखते हुए प्रशासन को गांव से 4 किलोमीटर दूर कैंप करना पड़ा।
इससे पहले, नवंबर 2023 में पेनहेती गांव में भील और बंजारा समुदाय के बीच हिंसक टकराव में गल सिंह भीलाला की मौत हो गई थी, जिसके बाद जवाबी कार्रवाई में 8 से 10 घरों और दो ट्रैक्टरों को आग के हवाले कर दिया गया। वहीं जुलाई 2023 में विष्णुपुरा में हुई झड़प में ग्रामीणों ने पुलिस पर भारी पथराव किया और 50 से अधिक वाहनों को क्षतिग्रस्त कर दिया था, जिसके बाद पुलिस को लाठीचार्ज और आंसू गैस का सहारा लेना पड़ा।
प्रवासियों का शोषण और ऐतिहासिक विस्थापन
जांच में यह भी सामने आया है कि कैसे स्थानीय रसूखदारों ने प्रवासी समुदायों का शोषण कर वन अधिकार अधिनियम के तहत जमीन के अधिकार हासिल किए।
सरेथा गांव में, 1960 के दशक में विस्थापित होकर आए पटेलिया समुदाय के लोगों को वन भूमि का रजिस्ट्रेशन कराने के लिए मुखौटे (फ्रंटमैन) के रूप में इस्तेमाल किया गया। पंजीकरण पूरा होते ही स्थानीय दबंगों ने आदिवासी मजदूरों को वहां से खदेड़ दिया, जिसके बाद ये लोग दुमावन और सरसलय्या जैसे क्षेत्रों में दाने-दाने को मोहताज होकर जीवन जीने को मजबूर हैं।
आगे क्या होगा?
इन बड़े खुलासों के बाद, वन विभाग इस करोड़ों रुपये के रैकेट के मुख्य साजिशकर्ताओं के खिलाफ औपचारिक एफआईआर (FIR) दर्ज करने की तैयारी में जुट गया है।
प्रशासन, जिसने हाल ही में चाचौड़ा में 60 जेसीबी मशीनों की मदद से 900 बीघा अतिक्रमित भूमि को मुक्त कराया था, से अब अन्य संवेदनशील क्षेत्रों में भी बड़े स्तर पर ध्वस्तीकरण अभियान चलाने की उम्मीद है।
अब देखना यह होगा कि राज्य सरकार इन अवैध स्टांप-पेपर सौदों में शामिल बड़े राजनीतिक और रसूखदार चेहरों के खिलाफ कितनी कड़ी कानूनी कार्रवाई सुनिश्चित करती है।
