संकट की लहरों में सीएम मोहन ने ढाल थामी, जड़ता पर अचूक वार किया, अब दवा सुरक्षा सर्वोच्च कर्तव्य
संवेदनशील नेतृत्व का अभूतपूर्व उदाहरणछिंदवाड़ा जिले में कथित रूप से कोल्ड्रिफ़ सीरप के सेवन से कई मासूम शिशुओं की दुःखद मृत्यु के हृदय विदारक...

संवेदनशील नेतृत्व का अभूतपूर्व उदाहरण
छिंदवाड़ा जिले में कथित रूप से कोल्ड्रिफ़ सीरप के सेवन से कई मासूम शिशुओं की दुःखद मृत्यु के हृदय विदारक घटनाक्रम ने केवल प्रदेश को ही नहीं, बल्कि मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव के संवेदनशील हृदय को भी अंदर तक झकझोर दिया। इस राष्ट्रीय त्रासदी को मुख्यमंत्री ने 'जनस्वास्थ्य के साथ गंभीर खिलवाड़' मानते हुए, संवेदनशीलता और प्रशासनिक सख़्ती का एक अभूतपूर्व संगम प्रस्तुत किया है। उन्होंने तत्काल स्वास्थ्य प्रशासन की लापरवाही पर कठोरतम रुख अपनाया और यह स्पष्ट कर दिया कि उनकी सरकार बच्चों की जान से जुड़े मामलों में किसी भी प्रकार की ढिलाई या लापरवाही को 'शून्य सहनशीलता' की नीति के तहत कतई बर्दाश्त नहीं करेगी। मुख्यमंत्री ने खुले शब्दों में यह दृढ़ संकल्प दोहराया कि, "बच्चों की जान के साथ खिलवाड़ अस्वीकार्य है — दोषियों पर कड़ी से कड़ी कार्रवाई होगी।" इस स्पष्ट और निर्णायक नेतृत्व के चलते औषधि नियंत्रण तंत्र में तत्काल प्रभाव से हड़कंप मच गया, क्योंकि यह सख़्त एक्शन डॉ. यादव के कार्यकाल की शुरुआत में ही जवाबदेह शासन की आधारशिला रखता है। उनकी इस त्वरित प्रतिक्रिया से जनता का भरोसा और मजबूत हुआ है कि सरकार बच्चों की सुरक्षा और स्वास्थ्य को सर्वोच्च प्राथमिकता दे रही है, और अब जनहित के मामलों में किसी भी अधिकारी को राजनीतिक या प्रशासनिक संरक्षण नहीं मिलेगा। इस निर्णय ने सिद्ध किया कि मुख्यमंत्री का हृदय जितना संवेदनशील है, प्रशासनिक निर्णय उतना ही अटल है।
प्रशासनिक सख्ती का ऐतिहासिक निर्णय
मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव के अदम्य साहस और दृढ़ इच्छाशक्ति का परिणाम प्रशासनिक इतिहास में एक स्वर्ण अध्याय बन गया है। उनके निर्देश पर, लोक स्वास्थ्य एवं चिकित्सा शिक्षा विभाग ने दिनांक 06.10.2025 को प्रशासनिक सख़्ती दिखाते हुए एक साथ चार प्रमुख अधिकारियों पर गाज गिराई है, जो 'शीर्ष से सख़्ती' के मुख्यमंत्री के मॉडल को दर्शाता है। राज्य सरकार ने इस संवेदनशील प्रकरण पर त्वरित निर्णय लेते हुए, वरिष्ठ भा.प्र.से. अधिकारी दिनेश मौर्य, जो राज्य के औषधि नियंत्रक के रूप में कार्यरत थे, उन्हें तत्काल प्रभाव से पद से हटा दिया। यह कार्यवाही बड़े अधिकारियों को संदेश देती है कि उनकी कुर्सी सुरक्षित नहीं है यदि वे अपने कर्तव्यों का निर्वहन नहीं करते। इसके अतिरिक्त, तीन प्रमुख अधिकारियों को निलंबित कर दिया गया, जिनमें उप औषधि नियंत्रक श्री शोभित कोष्टा (भोपाल), और औषधि निरीक्षक श्री शरद कुमार जैन (जबलपुर) तथा गौरव शर्मा (छिंदवाड़ा) शामिल हैं। यह कार्रवाई दर्शाती है कि मुख्यमंत्री ने प्रोटोकॉल के उल्लंघन और दायित्वों के निर्वहन में विफलता पर बिना किसी समझौते के, बड़े से बड़े पद पर बैठे अधिकारी पर भी कठोरतम एक्शन लेने में तनिक भी देर नहीं की। डॉ. यादव की सरकार ने सिद्ध कर दिया कि जनहित के सामने प्रशासनिक दबाव या पद का कोई महत्व नहीं है।

| संवेदना का शिखर: बच्चों के दुःखद निधन से मर्माहत मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने पीड़ित परिवार से मिलकर उन्हें ढांढस बंधाया और न्याय दिलाने का अटल आश्वासन दिया। मोहन है तो भरोसा है |
आदेशों में निहित लापरवाही की वीभत्सता
निलंबन आदेशों में अधिकारियों की लापरवाही का जो विवरण सामने आया है, वह न केवल चौंकाने वाला है, बल्कि सरकारी नियमों की घोर अवहेलना का प्रमाण भी है। निलंबन का मूल कारण भारत सरकार के DCGI (केंद्रीय औषधि मानक नियंत्रण संगठन) द्वारा जारी किए गए 18 दिसंबर 2023 के स्पष्ट दिशा-निर्देशों का पालन न करना था। इन निर्देशों में FDC of Chlorpheniramine Maleate + Phenylephrine HCl जैसे कॉम्बिनेशन की दवाओं का उपयोग 4 वर्ष से कम उम्र के बच्चों में पूर्णतः प्रतिबंधित किया गया था, तथा इस चेतावनी को लेबल पर अनिवार्य रूप से अंकित करना था। उप औषधि नियंत्रक श्री शोभित कोष्टा पर सीधा आरोप है कि बतौर नियंत्रण प्राधिकारी प्रदेश में उक्त दिशा-निर्देशों का औषधि निरीक्षकों के साथ उचित पर्यवेक्षण कर पालन कराने की जिम्मेदारी उनकी थी, जिसमें वे गंभीर लापरवाही बरतते हुए असफल रहे। वहीं, औषधि निरीक्षक श्री शरद कुमार जैन के कार्यक्षेत्र, जबलपुर में भी स्टॉकिस्ट द्वारा बिना निर्धारित मापदण्ड के भण्डारण पाया गया। इन अधिकारियों की अक्षमता और गंभीर लापरवाही के कारण ही Coldrif सीरप का गलत क्रय-विक्रय व भण्डारण हुआ, जिसने छिंदवाड़ा के परासिया में शिशुओं की अपूर्णनीय क्षति की और विभाग की छवि को घोर रूप से धूमिल किया।
कानून के आईने में जवाबदेही
मुख्यमंत्री के 'न्याय की डगर' पर लिए गए इस फैसले ने यह सुनिश्चित किया है कि अधिकारियों की लापरवाही केवल नैतिक नहीं, बल्कि कानूनी विफलता भी थी। निलंबित अधिकारियों पर स्पष्ट रूप से मध्यप्रदेश सिविल सेवा (आचरण) नियम 1965 के नियम 3 का उल्लंघन करने का आरोप लगा है। यह नियम सरकारी कर्मचारियों से यह अपेक्षा करता है कि वे अपने कर्तव्यों का निर्वहन ईमानदारी और पूर्ण निष्ठा से करें। निलंबन आदेशों में स्पष्ट उल्लेख है कि अधिकारियों ने अपने पदीय दायित्वों के निर्वहन में असफल व अक्षम सिद्ध होकर स्वयं को अनुशासनात्मक कार्यवाही का भागी बना लिया। यह दर्शाता है कि मुख्यमंत्री केवल भावनात्मक प्रतिक्रिया नहीं दे रहे थे, बल्कि संवैधानिक नियमों के तहत कड़े प्रशासनिक मानक स्थापित कर रहे थे। निलंबन अवधि के दौरान, तीनों अधिकारियों का मुख्यालय भोपाल रहेगा और उनके विरुद्ध विस्तृत विभागीय जाँच शुरू कर दी गई है। मुख्यमंत्री ने यह सुनिश्चित किया कि जांच में शामिल किसी भी स्तर के अधिकारी को 'राजनीतिक या प्रशासनिक संरक्षण' न मिले, जो उनकी पारदर्शिता और निष्पक्षता के प्रति प्रतिबद्धता को दर्शाता है। इस सख्ती ने पूरे प्रशासन तंत्र को झकझोर कर रख दिया है और उन्हें अपने दायित्वों के प्रति सजग रहने का अंतिम संदेश दिया है।
प्रदेशव्यापी शुद्धिकरण का संकल्प
मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव इस त्रासदी को एक सुधार का अवसर मानते हुए, भविष्य में ऐसी घटनाओं की पुनरावृत्ति को रोकने के लिए व्यापक प्रदेशव्यापी शुद्धिकरण का संकल्प लिया है। उन्होंने राज्य के सभी जिलों में औषधि निरीक्षण व्यवस्था की समीक्षा और सुदृढ़ीकरण के आदेश दिए हैं। अब शासन प्रदेशभर में औषधि भंडारण और वितरण व्यवस्था की राज्यव्यापी जांच की तैयारी में है, जिसके तहत औषधि विक्रेताओं और भंडारकों को लेकर भी नए दिशा-निर्देश पुनः जारी किए जा रहे हैं। यह प्रशासनिक सक्रियता यह सुनिश्चित करेगी कि ई-निरीक्षण पोर्टल और दवा सुरक्षा लेखा-परीक्षण जैसी व्यवस्थाएं केवल कागजों तक सीमित न रहें, बल्कि जमीनी स्तर पर प्रभावी हों। इसके साथ ही, राज्य सरकार ने इस पूरे मामले की जानकारी भारत सरकार के स्वास्थ्य मंत्रालय और केंद्रीय औषधि नियंत्रक (DCGI) को भेज दी है। केंद्र से तकनीकी विशेषज्ञों की टीम प्रदेश में भेजे जाने की संभावना है, जो यह जांच करेगी कि क्या अन्य जिलों में भी संयोजन दवाओं के गलत उपयोग या भंडारण के मामले सामने आए हैं। वरिष्ठ चिकित्सकीय औषधि विशेषज्ञ डॉ. विवेक पांडे ने मुख्यमंत्री के इस कदम को सार्वजनिक स्वास्थ्य की दिशा में सही और आवश्यक संदेश बताते हुए, उनके नेतृत्व की सराहना की है, जो उनके संकल्प को विशेषज्ञ समर्थन प्रदान करता है।

| हर पल जनता के साथ: मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव स्वयं ग्राउंड जीरो पर, पीड़ित परिवार की बात सुनी और उन्हें न्याय का भरोसा दिलाया। जन-जन की पीड़ा हरना ही डॉ. मोहन का धर्म है |
जनता के दिल में स्थापित अटल विश्वास
इस पूरे घटनाक्रम ने मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव की छवि को एक निर्णायक, संवेदनशील और कर्तव्यनिष्ठ नेता के रूप में अभूतपूर्व मजबूती दी है। उनकी त्वरित प्रतिक्रिया और बिना किसी दबाव में झुके कार्रवाई करने की क्षमता ने यह संदेश दिया है कि सरकार न तो किसी भी दबाव में झुकेगी, न लापरवाही को ढकेगी। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह कदम न केवल प्रशासनिक सख्ती का उत्कृष्ट उदाहरण है, बल्कि मुख्यमंत्री के जवाबदेह शासन मॉडल की सफलता की कहानी भी प्रस्तुत करता है। जनता के बीच यह भरोसा फिर से बना है कि बच्चों की सुरक्षा और स्वास्थ्य को सर्वोच्च प्राथमिकता दी जा रही है। मुख्यमंत्री ने अपनी दृढ़ इच्छाशक्ति और त्वरित निर्णय से यह सिद्ध कर दिया है कि वे केवल घोषणाएं नहीं करते, बल्कि जनहित के लिए कठोरतम निर्णय लेने में भी पीछे नहीं हटते। उनका यह मानवीय और प्रशासनिक कदम न केवल प्रशासन में भय और अनुशासन स्थापित करेगा, बल्कि प्रदेश की जनता के दिल में उनके लिए एक विशिष्ट, आदरणीय और अटल विश्वास भी पैदा करेगा। इस तरह, डॉ. मोहन यादव ने अपने शासनकाल की शुरुआत में ही सुशासन और संवेदनशीलता का एक नया मानक स्थापित कर दिया है।
